सौराष्ट्र की मेर जनजाति में गोदना प्रथा: नीलिमा पांडेय

सौराष्ट्र, गुजरात में मेर नाम की जनजाति निवास करती है। इन्हें महेर या मेहर कह कर भी पुकारा जाता है। खुद को क्षत्रिय बताने वाले मेर काफी बड़ी संख्या में पोरबंदर में निवास करते हैं। ये भगवान राम से अपनी उत्पत्ति स्वीकार करते हैं। इतिहास में सामन्तों के लड़ाके की भूमिका निभाने वाले मेर वर्तमान में पेशागत रूप से कृषक हैं।

बोलचाल में मेर गुजराती डाइलेक्ट का इस्तेमाल करते हैं। जनजातियों में गोदने की परम्परा की तलाश में उनसे राब्ता बढ़ा। हमने पाया कि मेर जनजाति के लोग बेहद आकर्षक और कलात्मक तरीके से गोदना बनाते हैं। मध्य भारत की तुलना में इनके रेखांकन और मोटिफ्स न सिर्फ खूबसूरती से अंकित होते हैं उनमें पर्याप्त विविधता भी देखने को मिलती है।

मेर जनजाति के गोदना मोटिफ्स में पावन चरित्रों के अंकन की परम्परा है। इसके अलावा कावड़ में माता पिता को बिठाए उन्हें तीर्थों के दर्शन करवाते श्रवण कुमार का चित्रण बहुतायत से मिलता है। भगवान राम और देवी लक्ष्मी के पद चिन्हों का अंकन भी गोदने में किया जाता है। पेड़ पौधों में नारियल, ताड़, आम, सुपारी, बबूल, चम्पा, बादाम का अंकन ख़ास है।

रेखांकन© एल. क्रूतक

मेर अपने गोदने में अनाज के दाने भी बनाते हैं। गोदने के रूप में कुएं का अंकन रोचक है। पनिहारिने और मोर भी मिलते है। इन्हें स्त्रियों के गले में हँसुली गोदते समय विशेष रूप से बनाया जाता है। रोजमर्रा की इस्तेमाल की जाने वाली वस्तुओं में पालना, मचिया/पीढ़ा/पेडेस्टल, लंगर, लोहे की कड़ियाँ (चेन), सिंहासन जैसी संरचना भी गोदने के रूप में स्त्रियों के शरीर पर देखी जा सकती है।

मेर पुरुष भी गोदना करवाते हैं। गोदना उनके शरीर पर सीमित मात्रा में अंकित होता है। स्त्रियों की तरह उनके शरीर गोदने से छपे नहीं होते। पुरुष अपने गोदने में ऊँट का अंकन करवाते हैं, जो प्रायः उनके दाएं कन्धे पर दिखता है। कन्धे के अलावा पुरुषों की कलाई और हाथ के ऊपरी हिस्से पर गोदना अंकित होता है।

लड़कियों में गोदना सात-आठ बरस की उम्र से शुरू हो जाता है। पहले-पहल हाथ और पैर गोदे जाते हैं। फिर गले और छाती पर गोदना रचता है। ब्याह से पहले लड़कियों का गोदना परंपरागत रूप से जरूरी समझा जाता है। ऐसा न होने पर ससुराल में सास के ताने सुनने पड़ते हैं। ससुराली ताने मायके को लेकर ही होते हैं।

ये हमारी पैन-इंडियन सांस्कृतिक विशेषता है। इन तानों में स्त्री के मायके को नीची हैसियत वाला बताने पर जोर होता है। इसी परिपाटी का अनुपालन मेर सासें भी करती हैं। गोदना रहित बहू को ये जताया जाता है कि उसके माँ-बाप कितने औसत या नीची हैसियत वाले थे कि गोदना भी न करवा सके। इस संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि मध्य भारत की जनजातियों की तरह सौराष्ट्र में भी गोदना सम्पत्ति के रूपक की तरह उपस्थित है।

गोदने को सम्पत्ति जताने वाला उनका एक गीत भी है, जिसमें स्त्रियां रामा की टेक पर बताती हैं कि मृत्यु के बाद बन्धु-बांधव, मां-बाप सभी हमें जलती चिता को सौंपकर वापसी की राह पकड़ते हैं। गोदना ही है जो हमारे शरीर के साथ चिता की आग में तपकर राख होता है और मृत्यु के साथ भी हमारे साथ बना रहता है।

मेर स्त्रियां अपने पैरों को खजूर, आम और बावल के पेड़ से सजाती हैं। पनिहारिनों की मेखला पायल की तरह खनकती है। उनके घाघरे के निचले हिस्से से झाँकने वाली ये मेखला आकर्षण बढ़ाने के लिए पहनी जाती है। पैरों पर सिंह और बाघ की जुगलबंदी भी मिलती है। पैरों का अगला हिस्सा गोदने से आच्छादित होता है। पिछले हिस्से पर चित्रांकन कम होता है। पैरों में चित्रांकन घुटने से नीचे की तरफ़ होता है।

रेखांकन© एल. क्रूतक

स्त्रियां के शरीर पर गोदने के रूप में रूप, गंध, मिठास वाले चम्पा के फूल भी मिलते हैं। इन पर भंवरों के आने न आने की तस्दीक तो मेर स्त्रियों से ही की जा सकती है। मधुमक्खी, घोड़ा और बिच्छू भी गोदे जाते हैं। साधारण मक्खियों और मिठाई का अंकन भी मिलता है।

गले का गोदना मेर स्त्रियों को सर्वाधिक प्रिय है। इसे गले के आभूषण हँसुली के नाम से संबोधित किया जाता है। हँसुली का चित्रांकन काफी विस्तार से किया जाता है। ढेर सारे मोटिफ्स मिला कर इसे गढ़ते हैं। हँसुली में एक पंक्ति पावन चरित्रों (Holy men) की होती है। इनको अंकित कराने का उद्देश्य स्त्रियों को चारित्रिक पतन से बचाना है।

चरित्र स्त्री जीवन की केंद्रीय धुरी है। उनकी पूरी जीवन चर्या उसी के इर्दगिर्द घूमती है। पितृ सत्ता उनको नियंत्रित करने के लिए पूरी मुस्तैदी से व्यवस्था को चाक-चौबंद रखती है। मेंटल कंडीशनिंग इस व्यवस्था का सर्वाधिक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके लिए कल्चरल मोटिफ्स बहुतायत से इस्तेमाल में लाये जाते हैं। स्त्रियों को शुद्ध और पवित्र बनाये रखने की मुहिम समाज में रूढ़ है। जनजातियां भी उससे मुक्त नहीं हैं।

वर्तमान में मेर जनजाति धार्मिक रूप से हिन्दू है। उनके धर्मिक रुझान का संकेत उनकी गोदना कला से भी मिलता है। राम और लक्ष्मी के पद चिन्हों के अलावा उनके गोदने में राम, कृष्ण और हनुमान का प्रतिमाशास्त्रीय अंकन भी शामिल है। ॐ लिखने का भी प्रचलन है। मन्दिर भी चित्रांकित किये जाते हैं।

मोटिफ्स जितने विविध है, उसी तरह से उनको रचने के लिए चुने गए रंगों में भी विविधता है। मेर स्त्रियां काले-नीले, हरे और लाल रंग में गोदनांकन करवाती हैं। इन्हें बनाने वाली स्त्रियां नट या वाघरि समुदाय की होती हैं। ये मूल रूप से घुमंतु जातियां है, जो आजीविका के एक माध्यम के रूप से इस काम को करती हैं।

नीलिमा पांडेय
असोसिएट प्रोफेसर, प्राचीन इतिहास एवं पुरातत्व विभाग,
लखनऊ विश्वविद्यालय, उत्तर प्रदेश