Thursday, July 18, 2024
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बुद्ध का वर्षावास-श्रावस्ती: नीलिमा पांडेय

नीलिमा पांडेय
असोसिएट प्रोफेसर, प्राचीन इतिहास एवं पुरातत्व विभाग,
लखनऊ विश्वविद्यालय, उत्तर प्रदेश

गोंडा और बहराइच की सीमा पर दो गाँव हैं सहेठ और महेठ। सहेठ गोंडा में पड़ता है और महेठ बहराइच का हिस्सा है। इनके भौगोलिक क्षेत्र से प्राचीन श्रावस्ती की पहचान की जाती है। अब ये नये बने श्रावस्ती जिले का हिस्सा हैं।

श्रावस्ती के जिक्र से सबसे पहले हमें गौतम बुद्ध, अनाथपिंडक और जेतवन की याद आती है। साथ ही ये भी याद आता है कि श्रावस्ती षोडस महाजनपदों में से एक कोसल की राजधानी का दर्जा रखती थी। बौद्ध साहित्य श्रावस्ती का न सिर्फ बार-बार जिक्र करता है बल्कि इसे गौतम बुद्ध से अभिन्न बताता है।

सिद्धार्थ से बुद्ध बनने का सफर तय करने के बाद गौतम बुद्ध ने अपने जीवन के अनेक वर्षा काल श्रावस्ती में व्यतीत किए। बुद्ध की चरणरज यहाँ पड़ी इसलिए यह स्थान बौद्ध धर्म और परंपरा में ख़ास माना गया। आज भी बौद्ध धर्म में आस्था रखने वालों के  लिए यह जगह  ख़ास है। बुद्ध के कदमों के निशान की तलाश में भटकने वाले पुरातत्ववेत्ताओं और इतिहासकारों ने भी इसे तरजीह दी। इस वजह से यह धार्मिक होने के साथ-साथ ऐतिहासिक पुरास्थल का भी दर्जा रखता है।

मूल गन्ध कुटी , जेतवन में बुद्ध का निवास स्थान

सारनाथ में धर्मचक्र प्रवर्तन के पश्चात गौतम बुद्ध ने अपना पूरा जीवन मध्यगंगा घाटी में उपदेश देने में व्यतीत किया। जिन स्थानों पर उनकी उपस्थिति इतिहास में दर्ज है उनमें से अधिकांश पूर्वी उत्तर प्रदेश और दक्षिणी बिहार (मगध) में स्थित हैं। घूम-घूम कर उपदेश देने की बुद्ध की दिनचर्या बरसात के मौसम में थम जाती थी। बरसात में वह एक स्थान पर टिक कर रहते थे। बौद्ध साहित्य इसका उल्लेख वर्षावास के रूप में करता है।

श्रावस्ती गौतम बुद्ध का पसंदीदा वर्षावास का स्थान है। परंपरा से यह माना जाता है कि उन्होंने यहाँ पर 24 वर्षावास व्यतीत किये। बुद्ध के श्रावस्ती प्रवास से प्रेरित होकर उनके अन्यन्य उपासक और श्रेष्ठी अनाथपिंडक ने यहाँ पर एक विहार का निर्माण करवाया। इसे हम जेतवन विहार के नाम से जानते हैं। जेत  उस राजकुमार का नाम है, जिसके वन की जमीन पर इस विहार का निर्माण करवाया गया।

जैन मंदिर

अनाथपिंडक को राजकुमार से यह जमीन हासिल करने में अच्छी ख़ासी मशक़्क़त करनी पड़ी। बौद्ध परम्परा में किस्सा मिलता है कि अनाथपिंडक ने पूरे वन की भूमि पर सोने की मोहरें बिछा कर इसकी कीमत अदा की थी। इस दृश्य को बौद्ध कला में प्रायः दर्शाया जाता है।

बहरहाल सहेठ गाँव से हमें इस विहार के साक्ष्य मिले हैं। आज की तारीख़ में तो हम नीव कुछ प्लेटफ़ॉर्मस, दान स्तूप वगैरह ही देख पाते हैं। फ़िर भी इतिहास की मालूमात हमें जगह को देखने की एक नई दृष्टि देती है और उससे लगाव बुद्ध की उपस्थिति की कल्पना से मन में पुलक भर देता है। बुद्ध के बारे में पढ़े हुए तमाम ऐतिहासिक तथ्य और उनसे जुड़े किस्से हमारी नज़रों के सामने तैर जाते हैं।

प्राचीन श्रावस्ती के महेठ वाले हिस्से से भी कुछ महत्वपूर्ण संरचनाएँ मिली हैं, जिनका ऐतिहासिक महत्व है। यहाँ से एक मंदिर मिला है जिसे तीसरे जैन तीर्थंकर संभवनाथ के जन्मस्थान के रूप में चिन्हित किया गया है। आगे कुछ दूरी पर अनाथपिंडक द्वारा निर्मित स्तूप के अवशेष देखे जा सकते हैं। आसपास के लोग इसे कच्ची कुटी के नाम से पुकारते हैं।

कच्ची कुटी

यहीं सड़क पार अंगुलिमाल की गुफा है। अंगुलिमाल एक दुर्दान्त डकैत था जो बुद्ध के प्रभाव में दुर्जन से सज्जन बन गया। बौद्ध शिल्प में इसे बारहा दर्शाया गया है। गुफ़ा अंगुलीमाल के रिहाइश की जगह के रूप में चिन्हित है।

ये जगहें पुरातत्व विभाग की निगहबानी में है। इनको आप धार्मिक मान श्रद्धा से नत हो सकते हैं, ऐतिहासिक मान कर पढ़ सकते हैं, पुरातात्विक मान कर इनका मौका-मुआयना कर विश्लेषण कर सकते हैं। पर असल मजा तो यायावर की पैनी दृष्टि के साथ घूमने में है। निस्पृह, शांत, एकांत मनोदशा के साथ। जब कोई एक रूझान आपको अतिरिक्त रूप से बाँधता नहीं है और दूसरा आपकी दृष्टि से छूटता नहीं है।

सारे ध्यान, ज्ञान, विमर्श के बीच तलाश इन्हीं सुकून के पलों की है, जो वहीं कहीं कैद हैं।

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