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पहाड़ की पगडंडी- मनोज शाह

चलो एक बार पहाड़ की पगडंडी घूम आते हैं एक अद्भुत तजुर्बा लिए जिंदगी झूम आते हैं जिंदगी क्या है जिंदगी की खुशी क्या है पल-पल की मस्ती...

मुझे जीना भी तेरे बग़ैर है- आलोक कौशिक

मैं जानता हूँ कि अब तू ग़ैर है मुझे जीना भी तेरे बग़ैर है फिर भी मोहब्बत है तुझसे मेरे दिल को मुझसे ही बैर है बसा रखा...

सरहद के उस पार- अरुण कुमार

रात को सोते समय मेरे मन में ख्याल आया, नींद की शुरुआत में ही एक ख्वाब आया कोई रिश्ता जरूर है जो टूट जाता बार-बार अधखुली पलकों...

पृथ्वी पर रहकर भी- जयलाल कलेत

वो उड़ रहा था आसमान पर, रब को ये मंजूर न था, पद के घमंड में हमेशा, इंसानियत से दूर था ढाया जुल्म कमजोरों पर, क्योंकि, सामने वाला मजबूर...

मजदूर, किसान है नाम रे- आशुतोष आशु

है भारत की आत्मा ये पहने ईमान की ताज़ है मजबूरी से है नाता इनका मजदूर, किसान है नाम रे पसीने से हैं सींचते अपने भारत के सोने का...

मानवता शर्मसार हुई- गरिमा गौतम

इंसान नहीं हैवान थाजो ऐसा कुकृत्य कियाएक बेजुबान प्राणी कोफटाखे से मार दियाकितनी तड़पी होगीजब मुँह में आग लगी होगीतपिश आग...

जीवन के हर पथ पर- त्रिवेणी कुशवाहा

जन्म मरण जीवन के संग हैं नचाये एक मदारी, मरा नहीं वही जो खतरों का बना खिलाड़ी जीवन के हर पथ पर जोखिम उठानें पड़तें हैं, काटों के पथ पर...

आशिक़ी हूं मैं किसी और की- आलोक कौशिक

आशिक़ी हूं मैं किसी और की, कह गई छत से पहले ही दीवार ढह गई जब से सुलझाया उसके गेसुओं को ज़िंदगी मेरी उलझ कर रह गई जो...

सो गए नभ के सितारे- रकमिश सुल्तानपुरी

बादलों की ओढ़ चादर सो गए नभ के सितारे अनवरत बूंदों की रिमझिम वृक्ष-सम्पुट-शोर को सुन घोसलों से चोंच भरकर अम्बु छकते हैं चिरंगुन घन लिए घनघोर बारिस आर्द्र करते हैं धरा को , हो रही...

तेरी छवि दिखला दे- गरिमा गौतम

घट-घट में हैं राम बसे कण-कण में हैं कृष्ण व्याकुल मन अब चाहे खुल जाए तेरे पट कान तरस गये भगवन तेरे भजनों की तान को श्रद्धा भाव से झुकता...

आधार है जीवन का पानी- अरुण कुमार

पानी-पानी कर डाला पानी पानी बिन आंख झरे पानी मृत प्राणी होता बिन पानी आधार है जीवन का पानी सूखी नदियां झरने सूखे सरिता का यौवन है पानी बिन पानी...

कहाँ तक गिरोगे- अनिल कुमार मिश्र

कहाँ तक गिरोगे मनुज तुम बताओ कहां तक गिरोगे? अरे कोई सीमा तो गिरने की होगी दिल तो दहलता तुम्हारा भी होगा सोच है संकुचित मन मे कितना...

वास्तविकता का वर्णन करता हूँ मैं- त्रिवेणी कुशवाहा

दर्पण के उजाले में मेरा अक़्स नजर आया, जीवन की वास्तविकता से दर्शन है कराया दूसरों की कमी सदा देखते तुम कभी अपनी भी तुम देख लो, पत्थर फेंकना आसान...

भुलाये नहीं गये- निशांत खुरपाल

तुझ पर लिखी शायरी के किस्से, भुलाये नहीं गये, कुछ गीत अभी भी बाकी हैं, जो गुनगुनाये नहीं गये तुझे तो शरीर के ज़ख्म देख, चक्कर...

शिक्षा का नवीन स्वरूप- वीरेन्द्र प्रधान

गुरुकुलों से आज तक आते-आते शिक्षा में हुए नये-नये प्रयोग हुये सुधार भी नाना प्रकार कुछ से उन्नयन हुआ तो कुछ से बंटाधार समाज में मूल्यों में गिरावट...

कोई भी मौसम हो-जयलाल कलेत

वो खूब हंसी उड़ाते हैं, मुझको छोटा जताते हैं, लोग उतनी ही मजबूती से, खामियां मेरी बताते हैं पर कोई भी मौसम हो, बागों में फूल महकते हैं, लोग नजरों...

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