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छंदों के स्वर लहराए- स्नेहलता नीर

विरही मन व्याकुल तड़प रहा, नयना गागर छलकाए हैं। आकुलित हृदय में प्यार भरे, छंदों के स्वर लहराए हैं। सुधियों का उपवन हरा-भरा, बीते दिन याद दिलाता है। मिलने को...

है प्रेम अपना- स्नेहलता नीर

हर शय बनी है ऐसे, जैसे कि हों शरारे। गर्दिश में फँस गए हैं, तकदीर के सितारे। है प्रेम अपना गंगा, दो तट सनम हैं हम तुम, कैसे मिलेंगे बोलो, नदिया...

तुम मुरली मधुर बजाओ- स्नेहलता नीर

बलवती कामना अंतर की, बंशीधर मैं तुमको पाऊँतुम मुरली मधुर बजाओ जब, तब स्वर लहरी मैं बन जाऊँ मैं राह निहार रही कबसे, अँखियाँ कान्हा...

बहती नदिया की धारा-सा- स्नेहलता नीर

मोहपाश सब काट जगत के, अब स्वतंत्र हो जाओ मुक्त उड़ानें भरते पंछी, जैसा अंबर पाओ बहती नदिया की धारा-सा, इस जीवन का चलना शूल बिछे हों...

कठपुतली- स्नेहलता नीर

नारी को हक कब दिया, जिसकी वो हकदारफिर भी तो हर रूप में, लुटा रही नित प्यारलुटा रही नित प्यार, काम घर का सब...

प्रीत का मौसम- स्नेहलता नीर

खिल गए हैं फूल कोयल छेड़ती सरगममीत मन भाने लगा है प्रीत का मौसम कर रहा है नवसृजन ऋतुराज धरती परमन प्रफुल्लित मन रहा त्यौहार...

सूखी पड़ी नेह की नदिया- स्नेहलता नीर

सूखी पड़ी नेह की नदिया, मरुथल हुई प्रीति की पुलकन सुख की कोरी रही कल्पना, झुलस रहा मन का वृंदावन नहीं प्रेम की एक बूँद भी,इस...

पहले मुझको वर लेना- स्नेहलता नीर

परम लक्ष्य संधान करो जब, याद मुझे भी कर लेना साया बनकर साथ चलूँगी, पहले मुझको वर लेना पथ के शूल सभी चुन लूँगी, दूँगी तुम्हें...

हर पल लगता डर- स्नेहलता नीर

साँस-साँस सहमी-सहमी है, हर पल लगता डर। भूचालों पर खड़े काँपते सुख-सपनों के घर। दिन मेहनत के बल पर गुजरे, जाग-जाग रातें। आसमान भी लेकर आता बेमौसम...

स्वप्न हर रंगीन है- स्नेहलता नीर

रंजो-ग़म का है असर हर शख़्स ही ग़मगीन है चैन की टूटी न जाने किसलिये अब बीन है आज ज़ुल्मी ज़ुल्म करके घूमता बेख़ौफ़ पर बेड़ियों में...

संबंंधों में गहरी खाई- स्नेहलता नीर

लपटें ऊँची उठीं बैर की, संबंंधों में गहरी खाई। दुर्वासित हो गयी, प्रीति का, सौरभ छलकाती पुरवाई। ढोंगी, ठेकेदार धर्म के, बाँट रहे हैं इंसानों को। शर्म नहीं आती रत्ती...

नए साल में- स्नेहलता नीर

अदावत मिटाएँ नए साल में सब मुहब्बत बढ़ाएँ नए साल में सब उगी नागफनियाँ चुभें ख़ार-कीकर गुलों को खिलाएँ नए साल में सब बनी कोढ़ सी रीत घातक...

हिम्मत मत यूँ हार पथिक- स्नेहलता नीर

हिम्मत मत यूँ हार पथिक क्यों बेबस है मजबूर है। चलता चल तू देख सामने, लक्ष्य अभी कुछ दूर है। पथ के कंटक फूल बनेंगे, टूटेंगे अवरोध सभी। मन में...

चक्कर पर चक्कर हैं- स्नेहलता नीर

डगर शूल से पटी पड़ी है, चक्कर पर चक्कर हैं जीना दुष्कर है नैनों में, आँसू के सागर हैं मर्यादाएँ मरीं हुईं सब, अनाचार है जागा दिखने...

साँप से भी विषैला हुआ आदमी- स्नेहलता नीर

लाज क्यों लुट रही, मच रही खलबली देश की फिर कहीं लाड़ली क्यों जली. यदि यही सभ्यता है तो धिक्कार है, हो रही है मनुजता जहाँ जंगली सूर्य...

हम निडर होकर बढ़ेंगे- स्नेहलता नीर

हौसले हैं साथ तो हम, मंजिलें पाकर रहेंगे। हों डगर में शूल फिर भी, हम निडर होकर बढ़ेंगे। कर्म को पूजा समझकर, हम अहर्निश काम करते। पर...

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