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इश्क़ का दर्द: रकमिश सुल्तानपुरी

वक़्त लगता पुरानी सदी की तरहआदमी न रहा आदमी की तरह हाव से, भाव से, बात व्यवहार...

बचपन: जॉनी अहमद

इससे पहले की इस जहाँ का सच समझ जाएआओ बचपन की कहानी में कहीं खो जाए हमको...

जन्नत समझ उसे: समीर द्विवेदी

कहते हैं जिसको प्यार, इबादत समझ उसेमिल जाए प्यार, रब की इनायत समझ उसे नाकाम ही रहे...

ग़म बढ़ जाता है: जॉनी अहमद

पेड़ भला कब अपना फल खा पाता हैभेड़ भला कभी ऊनी मफ़लर लगाता है बच्चों जैसी हरकते...

बहलाए कौन: गौरीशंकर वैश्य

दर्पण को झुठलाए कौनउलझन को सुलझाए कौन हवा बहुत दुःखदायी हैलोरी गा, बहलाए कौन

गांव का घर: कृष्ण गोपाल सोलंकी

भाईचारा, प्रेम निजता का तराना छोड़करकर रहे हैं सब सियासत दोस्ताना छोड़कर घोटती है दम बेशक़ शहर...

अच्छा नहीं हुआ: सय्यद ताहा कादरी

मैं क्या कहूं कि साथ मेरे क्या नहीं हुआ अच्छा भला किया था पर अच्छा नहीं हुआ कैसे करेगा मुझसे नदामत का तजकिरा जिसको कभी यक़ीन भी...

देखें हैं ख़्वाब मैंने: डॉ भावना श्रीवास्तव

इस बात पे यकीं है हर बात से ज़ियादामुझको मिला है मेरी औक़ात से ज़ियादा इक शाम बाम पे जो उतरा था इक सितारादेखे हैं...

आदमी का भरोसा नहीं: रकमिश सुल्तानपुरी

तुमने क़िरदार कोई भी परखा नहीं आजकल आदमी का भरोसा नहीं ख़्वाब कैसे बुने दायरों से अलग, जब किसी का यहां ख़्वाब पूरा नहीं जो मेरे दिल में...

मिल सका ना फिर हमें: रवि प्रकाश

मिल सका ना फिर हमें वो दीदार देखिए आज भी है आपका इंतजार देखिए रूठना तो ठीक है मुकरना सही न था अब न होगा फिर कभी...

उसकी खैरियत: संजय अश्क़

लबों पर तेरा नाम हो या ना हो मग़र, दिल की धड़कनें तेरे नाम से चलती है। जब भी उदास हो जाता हूं जीवन में, मन में...

खेत गधे चर गए: गौरीशंकर विनम्र

इधर से उधर गए। लग रहा सुधर गए। पुलिस और दुष्कर्मी पीड़ित के घर गए। फसल हुई अच्छी थी खेत गधे चर गए। विज्ञापन हुए नहीं खाली पद भर गए। खोज रहे...

आईना सच का: रकमिश सुल्तानपुरी

ज़ुर्म मेरा हो तो मुझको ही सताया जाए इश्क़ को बीच में ऐसे न घसीटा जाए इश्क़ तो पाक है महफ़ूज यहां हर कोई, दोस्त हो दोस्त...

चेहरा बना दिया: रकमिश सुल्तानपुरी

ख़ुशहाल जिंदगी का तमाशा बना दिया पल भर में आपने मुझे झूठा बना दिया सुनते भला कहाँ से मुहब्बत की चीख हम, जिस्मों की भूख ने हमें...

लोग बदल गए: मुकेश चौरसिया

वक्त जो बदला लोग बदल गए, सच के सब उपयोग बदल गए। पद, पैसा, सत्ता, मद, लालच, अब आदम के रोग बदल गए। तीन हुआ या पाँच हुआ...

नया वादा: जॉनी अहमद

आख़िर कैसे नए वादों पर ए'तिबार किया जाए पुरानी साज़िशों को कैसे दरकिनार किया जाए। क़ातिल क़त्ल की ताक़ में ज़मानों से सोया नहीं आख़िर सोए हुओं...

ज्योतिष

साहित्य

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