लखनऊ हाईकोर्ट की पीठ ने मंगलवार, 18 अगस्त को 2011 में चलती ट्रेन से गिरकर जान गंवाने वाले एक व्यक्ति की विधवा के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि मृतक के पास से रेलवे टिकट बरामद न होना, उसके आश्रितों को मुआवजा देने से इनकार करने का आधार नहीं हो सकता। न्यायमूर्ति सैयद कमर हसन रिजवी की एकल पीठ ने अपील स्वीकार करते हुए रेलवे दावा न्यायाधिकरण के 2017 के आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें शिव नारायण सिंह की पत्नी लाली के मुआवजा दावे को खारिज किया गया था। हाईकोर्ट ने ₹8 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया है और निर्धारित समय पर भुगतान न होने की स्थिति में 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।.
मृतक के परिवार को 19 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश
विधवा के पति 21 नवंबर 2011 को इटावा से दिल्ली जाने वाली लाल किला एक्सप्रेस में सवार हुए थे और कथित तौर पर सराय भूपत रेलवे स्टेशन के पास चलती ट्रेन से गिर गए. दलील दी गई कि प्रारंभिक भार दावेदार पर है कि वह वास्तविक यात्रा को साबित करे, लेकिन यह भी कहा गया कि टिकट की अनुपस्थिति स्वत: ही दावे को खारिज नहीं करती है.
इस मामले में विधवा और एक अन्य गवाह ने गवाही दी कि विधवा के पति ने द्वितीय श्रेणी का टिकट खरीदा था. रेलवे उनके दावे का खंडन करने के लिए टिकट बिक्री के रिकॉर्ड या अन्य सबूत पेश करने में विफल रहा. हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के इस तर्क को खारिज कर दिया कि मृतक के शरीर के तीन टुकड़ों में मिलने से यह साबित होता है कि पटरियों पर चलते समय उस पर ट्रेन चढ़ गई थी.










