काश: वंदना मिश्रा

प्रोफेसर वंदना मिश्रा
हिन्दी विभाग
GD बिनानी कॉलेज
मिर्ज़ापुर- 231001

हिंदू इतना मुसलमान सा
और सिख इतना ईसाई सा दिख रहा था
महाविद्यालय में कि कहा नहीं जा सकता था
कि तुम क्या बना बनो
तो अच्छे लगोगे
अंत तक नहीं निर्णय हुआ तो
किसी को भी कुछ भी बना दिया गया
और जब जो बना
वह उतना ही कट्टर लगा
उतना ही सजीव
खुशबू ऐन मुसलमान की तरह
और यास्मिन पंडितानी सी

जो दक्षिण भारतीय बना
उसने कभी उत्तर प्रदेश से
बाहर कदम नहीं रखा था

कभी महाराष्ट्र नहीं गई लड़की ने
लावनी से
दिल जीत लिया निर्णायकों का

गुजराती बनी लड़की ने गरबा किया
तो गर्व हो गया हम लोगों को
उसकी शिक्षिका होने का

जबकि गुजरात से उसका दूर-दूर तक
कोई संबंध नहीं था

मन में प्रार्थना उठी

काश!
बस ऐसे ही हम पहचान ना पाएं तुम्हें या खुदा!
कि भगवान हो या
जरथुस्त्र तुम