काम प्यारा होता है: वंदना मिश्रा

वंदना मिश्रा

कर्तव्यों की तनी हुई रस्सी पर
नटिनी की तरह
चलती आई स्त्री
अपना ठहरना पाप समझती है
“स्त्री चाहे तो…”
वगैरह-वगैरह
सुन सुन कर अपनी चाह भूल चुकी
सब कुछ आठ हाथों से सम्भालती
भूल गई कि
देह मिट्टी की बनी है
और ज़ंग तो लोहे को भी
लगता है
अपनी देह के थकने को
ग्लानि की तरह लेती है
उसे रटाया गया था
“काम प्यारा होता है चाम नहीं”
पर सध नहीं पाती देह
“अब और नहीं” कह कर
चीख रहें हैं घुटने
अपनी थकान और शारीरिक पीड़ा को
ग्लानि की तरह बताती
स्त्री को

सिर्फ़ दवा नहीं
बातों और साथ का
मरहम भी देना

जिसने
देह को देह
नहीं समझा,

कभी उसके मन को तो समझो