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चोरी कर के चाँद की- डॉ रंजना वर्मा

चोरी कर के चाँद की, गयी अमावस रात अम्बर से होने लगी, आँसू की बरसात धरती पर इंसान ने, जब भी पाया जन्म, विधना से पायी सदा,...

साँप से भी विषैला हुआ आदमी- स्नेहलता नीर

लाज क्यों लुट रही, मच रही खलबली देश की फिर कहीं लाड़ली क्यों जली. यदि यही सभ्यता है तो धिक्कार है, हो रही है मनुजता जहाँ जंगली सूर्य...

सोये ख्वाबों को- श्वेता सिन्हा

सोये ख्वाबों को जगाकर चल दिए आग मोहब्बत की जलाकर चल दिए खुशबू से भर गयी गलियाँ दिल की एक खत सिरहाने दबाकर चल दिये रात भर चाँद...

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