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साँप से भी विषैला हुआ आदमी- स्नेहलता नीर

लाज क्यों लुट रही, मच रही खलबली देश की फिर कहीं लाड़ली क्यों जली. यदि यही सभ्यता है तो धिक्कार है, हो रही है मनुजता जहाँ जंगली सूर्य...

सोये ख्वाबों को- श्वेता सिन्हा

सोये ख्वाबों को जगाकर चल दिए आग मोहब्बत की जलाकर चल दिए खुशबू से भर गयी गलियाँ दिल की एक खत सिरहाने दबाकर चल दिये रात भर चाँद...

ऐ ख़ाक-ए-बदन- सूरज राय सूरज

माँ, बाप, बहन, भाई, सगे यार बहुत थे अये ख़ाक-ए-बदन, तेरे चमत्कार बहुत थे सबकी तरह मुझे भी दिया सांस का सफ़र फिर मेरी रहगुज़र में ही...

जाने कौन सा दर्द वो छुपा रहा था- पुष्प प्रेम

हंस हंसकर सबको दिखा रहा था जाने कौन सा दर्द वो छुपा रहा था गम तो खैर खुद उसका था मगर किसी और के नाम से बता...

देख तेरे सारे अफ़साने रूठ गए- पूनम प्रकाश

क्या वाइज़ और क्या दीवाने रूठ गए। जो भी आए थे समझाने रूठ गए। शिद्दत मेरी प्यास की देखी ही थी और दुनिया के सारे मैखाने रूठ...

लफ़्ज़ मेरे तौलने लगे- श्वेता सिन्हा

अच्छा हुआ कि लोग गिरह खोलने लगे। दिल के ज़हर शिगाफ़े-लब से घोलने लगे।। पलकों से बूंद-बूंद गिरी ख़्वाहिशें तमाम। उम्रे-रवाँ के ख़्वाब सारे डोलने लगे।। ख़ुश देख...

दिल में कितने राज हैं- स्नेहलता नीर

दिल बना फ़ौलाद का मुश्किल से घबराता नहीं धार उल्टी वक़्त की हो खौफ़ ये खाता नहीं अब तराने भी मुहब्ब्त के कोई गाता नहीं प्यार में...

वो सपने फिर सजाना चाहता है- प्रिया सिन्हा संदल

मुक़द्दर को दिखाना चाहता है। ख़ुदी को आज़माना चाहता है।। बिखेरे वक़्त की आँधी ने जो भी वो सपने फिर सजाना चाहता है।। लगे है दाग जितने हारने...

दिल टाँक दूँ मैं तुम्हारे गालों में- श्वेता सिन्हा

तुम ही तुम छाये हो ख़्वाबों ख़्यालों में दिल के शजर के पत्तों में और डालों में लबों पे खिली मुस्कान तेरी जानलेवा है चाहती हूँ दिल...

दिल की कभी सुनी जाए- पूनम प्रकाश

काश सब की दुआ सुनी जाए खाली झोली नहीं कोई जाए क्या ज़रूरी है दर्द की दौलत, बारहा मेरे नाम की जाए हाए जाने ये इन अँधेरों की, कब...

मुहब्बत हो अगर दिल में तो- स्नेहलता नीर

कभी तलवार के वारों से, बख्तर टूट जाता है मुहब्बत हो अगर दिल में तो, ख़ंजर टूट जाता है वफ़ा करके मिले जब बेवफ़ाई और रुसबाई हृदय...

ठिकाना ढूंढता हूँ- चंद्र विजय प्रसाद

साजिशों के शहर में ठिकाना ढूंढता हूँ गुज़रे हुए जमाने का फसाना ढूंढता हूँ कहूँ किससे चल पड़ा सफ़र में अकेला क्यों गर्दिशों में खुद अफसाना ढूंढता...

मैं जिसमें उतर गया कल शब- रामरज फ़ौजदार फौजी

ज़मीर ही था, मैं जिसमें उतर गया कल शब अचानक आईना देखा तो डर गया कल शब हरे भरे हुए शादाब दरख़्तों की हवा चली भी यूँ...

दिल परेशाँ है उसकी ख़ातिर ये- चित्रा भारद्वाज सुमन

दिल परेशाँ है उसकी ख़ातिर ये और कर बैठी उसको ज़ाहिर ये फिर से दरिया सराब निकला तो प्यासा मर जाएगा मुसाफ़िर ये कुछ असर ही नहीं हुआ...

वो गुम रहे- श्वेता सिन्हा

वो गुम रहे अपने ही ख़्यालों की धूल में करते रहे तलाश जिन्हें फूल-फूल में गीली हवा की लम्स ने सिहरा दिया बदन यादों ने उनकी छू...

दिल हमने अक्सर यूँ बहला कर देखा है- पुष्प प्रेम

अपने ही जख्मों को सहला कर देखा है दिल हमने अक्सर यूं बहला कर देखा है बीते वक्त के निशान छुपाने की खातिर जिस्म को भी अपने...

ज्योतिष

साहित्य

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