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सिवाय मेरे: रूची शाही

तुम्हारी पसंद की चीज़ों सेअपना कमरा तो सजा लिया मैंनेपर कमरे में तुम्हारी अनुपस्थितिबहुत आहत करती है मुझे

एक और अनेक: जसवीर त्यागी

कोई भी काम करने के लिए पहली सीढ़ी तुम्हारा एकाग्र होना है बाकी सब उसके बाद की सीढ़ियां हैं एकाग्रता के पहले ही पायदान पर पैर जमाना कितना जटिल और...

रिश्ते दिल के: हर्षिता डावर

रिश्ते बनाने बहुत आसान है पर निभाने में जद्दोजहद लगती है ज़िन्दगी में ये वही कमाल है, कभी हमको ये एहसास समझने में जन्म लग जाते हैं कभी...

बेटी की विदाई: जसवीर त्यागी

वह एक लोक गीत था बेटी की विदाई का जिसकी भाषा हमारी भाषा से भिन्न थी गीत के बोल हमारी पकड़ से परे फिर भी सुनने वालों की आँखें नम थीं भाषा...

अन्नदाता: दिनेश प्रजापत

चलो आज हम  एक बात करते हैं अन्नदाता को फिर याद करते हैं, आज हम उनकी भी सुनते हैं चलो उस  किसान की बात रखते हैं वो कठिन...

बेटी तो है घर की शान: ममता शर्मा

बेटी तो है घर की शान फिर क्यों नहीं करते तुम उनका सम्मान क्यों तुम उसे दुनिया में आने से पहले देते हो मार क्यों करते हो उनके साथ ऐसा...

हूँ बयार सी: गरिमा गौतम

भावुक हूँ बहुत मैं भावनाओं में खो जाती हूँ या तो जुड़ती नहीं हूँ, जुड़ती हूँ तो, शिद्दत से निभाती हूँ छोटी सी बात भी मुझे कभी बहुत खुशी दे...

जाति धर्म प्रांत से परे: जसवीर त्यागी

मेट्रो ट्रेन में तीन-चार साल का सुंदर-सलोना बच्चा स्वच्छंद घूम रहा है यहाँ से वहाँ किसी को छेड़ता किसी का सामान छूता किसी को देखकर हँसता-मुस्कुराता बेवजह-बेबात नहीं जानता सामने वाले इंसान...

अधूरापन: राजन कुमार

अधूरा तन, अधूरी सांस अधूरा मन, अधूरी प्यास अधूरा दिल, अधूरी आस अधूरा प्यार, अधूरी चाह अधूरा सा मेरा महताब अधूरा मिलन, अधूरी बात अधूरा साथ, अधूरी मुलाकात अधूरा दिन, अधूरी...

हे स्त्री: गरिमा गौतम

हे स्त्री तू कहाँ छोड़ती है साथ जो जुड़ती है एक बार निभाती है सात फेरों के सात वचनों का साथ न्यौछावर करती तन मन जीवन हे स्त्री तू कहाँ छोड़ती है छोड़ती है...

आसान और मुश्किल: गरिमा गौतम

आधी रात उठे और चल देना।कितना मुश्किल है यशोधरा बनना,अश्रु छुपा मुस्कराते रहना।कितना आसान है राम बनना,निर्दोष भार्या की परीक्षा...

सत्य जीवन संदर्शन: गौरीशंकर वैश्य

कुछ हैं जो नहीं करते सूर्य की उपासना वे होते हैं दानव, दैत्य, राक्षस अमानुष, निशिचर, उलूक वे कभी सवेरा नहीं देख पाते वे रात्रि को जीते हैं रातभर जागते हैं अंधकार के हैं...

बढ़ना लक्ष्य की ओर: दिनेश प्रजापत

यह धरा देती है अन्न, धन, संवारती मानव जीवन प्राणवायु देते यह वृक्ष, जीने की राह सिखाती, निरंतर चलती यह नदियां सम्मान से सिर ऊंचा रखना, सिखाते यह अविचलित खड़े पर्वत...

अनसुनी आवाज़: दुपिंदर गुजराल

मेरी किलकारियों को सुन कर तो देखो मेरी आवाज़ को ऊँचाइयों की बुलंदियों को छूते हुए तो देखो मुझ पर विश्वास करके तो देखो मुझे अपनी ज़िंदगी...

साफ़ साफ़ लिखा था: जॉनी अहमद

सफ़्हे के हर सफ़ में साफ़ साफ़ लिखा था वो ना-तमाम किस्सा साफ़ साफ़ लिखा था भले उल्फ़त में हमें बदनामी के दाग धब्बे मिले हमने नाम...

तीन लोग: आलोक कौशिक

तीन लोग संसद के बाहर प्रदर्शन कर रहे थे और नारे लगा रहे थे एक कह रहा था हमें मंदिर चाहिए दूसरा कह रहा था हमें मस्जिद चाहिए और तीसरा कह रहा...

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