मध्य प्रदेश पावर ट्रांसमिशन कंपनी में कनिष्ठ अभियंताओं (Junior Engineers) की पदोन्नति का विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार मामला वर्ष 1987 से भर्ती बोर्ड कैडर के इंजीनियरों से जुड़ा है। मप्र विद्युत मंडल पत्रोपाधि अभियंता संघ ने आरोप लगाया है कि वर्षों तक पदोन्नति प्रक्रिया लंबित रहने और प्रशासनिक स्तर पर हुई विसंगतियों के कारण वरिष्ठ अभियंता अपने से 10 से 15 वर्ष जूनियर अधिकारियों के अधीन काम करने को मजबूर हैं।
संघ का कहना है कि यह स्थिति न केवल सेवा नियमों के खिलाफ है, बल्कि कर्मचारियों के मनोबल पर भी नकारात्मक असर डाल रही है। इसलिए संगठन ने सरकार और कंपनी प्रबंधन से जल्द समाधान की मांग की है।
पुनर्गठन के बाद बढ़ा विवाद, वर्षों तक नहीं हुई DPC
संघ के अनुसार मध्य प्रदेश विद्युत मंडल के पुनर्गठन के बाद बोर्ड कैडर और कंपनी कैडर को अलग-अलग कर दिया गया था। हालांकि, इसके बावजूद बोर्ड कैडर के कर्मचारियों की पदोन्नति प्रक्रिया समय पर पूरी नहीं हुई। संगठन का आरोप है कि वर्ष 2011 से 2016 के बीच विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) की बैठक ही आयोजित नहीं की गई। इसका सीधा असर कनिष्ठ अभियंताओं की पदोन्नति पर पड़ा।
नतीजतन, सहायक अभियंता के नियमित पदोन्नति आदेश वर्षों तक लंबित रहे। इस देरी की वजह से कई अधिकारी समय पर उच्च पद तक नहीं पहुंच सके। बाद में मामला न्यायालय तक पहुंचा। इसके बाद वर्ष 2024 में उच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि पात्र अधिकारियों को वर्ष 2011 से पदोन्नति का लाभ दिया जाए। इसके बावजूद संघ का कहना है कि जमीनी स्तर पर स्थिति अब भी पूरी तरह नहीं सुधरी है।
20 साल तक जिम्मेदारी निभाई, लेकिन अनुभव नहीं माना गया
संघ ने एक और गंभीर मुद्दा उठाया है। संगठन के मुताबिक वर्ष 2006 से 2010 के बीच कई कनिष्ठ अभियंताओं से करंट चार्ज के रूप में सहायक अभियंता की जिम्मेदारी लगातार ली गई। यानी उन्होंने वर्षों तक उच्च पद का कार्य किया। हालांकि, उस अवधि को न तो उनकी वरिष्ठता में जोड़ा गया और न ही नियमित पदोन्नति का लाभ दिया गया।
इसके बाद जुलाई 2026 में इन अधिकारियों को नियमित पदोन्नति तो मिल गई, लेकिन लगभग दो दशक का अनुभव प्रशासनिक रिकॉर्ड में मान्यता नहीं पा सका। संघ का कहना है कि जिन अधिकारियों ने वर्षों तक उच्च पद की जिम्मेदारी निभाई, उनके अनुभव को नजरअंदाज करना पूरी तरह अनुचित है। इससे कर्मचारियों में असंतोष लगातार बढ़ रहा है।
जूनियर अधिकारी पहुंचे ऊंचे पद, वरिष्ठ रह गए पीछे
संघ का आरोप है कि दूसरी ओर वर्ष 2011 में सीधी भर्ती के माध्यम से नियुक्त कंपनी कैडर के सहायक अभियंताओं को समय पर पदोन्नति मिलती रही। यही कारण है कि करीब 15 वर्षों में कई अधिकारी कार्यपालन अभियंता (Executive Engineer) के पद तक पहुंच गए।
इसके विपरीत बोर्ड कैडर के कई वरिष्ठ अधिकारी अब भी पदोन्नति की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इतना ही नहीं, संगठन का दावा है कि बोर्ड कैडर के लिए आरक्षित 75 पदों पर भी कंपनी कैडर के अधिकारियों द्वारा दावा किया जा रहा है। संघ का कहना है कि यह व्यवस्था पहले से तय नियमों और उच्च न्यायालय की भावना के भी विपरीत है। इसलिए इस मामले में स्पष्ट निर्णय लिया जाना जरूरी है।
संघ ने सरकार और प्रबंधन से की तत्काल कार्रवाई की मांग
मप्र विद्युत मंडल पत्रोपाधि अभियंता संघ ने इस पूरे मामले को सेवा न्याय का गंभीर विषय बताया है। संघ के सचिव आशीष जैन ने कहा कि बोर्ड कैडर के वरिष्ठ सहायक अभियंताओं के लंबे अनुभव और न्यायालय के निर्देशों को ध्यान में रखते हुए उन्हें तत्काल कार्यपालन अभियंता का करंट चार्ज दिया जाना चाहिए।
इसके साथ ही लंबित पदोन्नति मामलों का स्थायी समाधान निकालने की भी मांग की गई है। संगठन का कहना है कि यदि समय रहते इस विवाद का समाधान नहीं किया गया, तो बड़ी संख्या में प्रभावित अधिकारी आंदोलन का रास्ता अपनाने पर मजबूर हो सकते हैं।
वरिष्ठता और अनुभव को लेकर उठे बड़े सवाल
यह मामला केवल पदोन्नति तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी संस्थानों में वरिष्ठता, अनुभव और प्रशासनिक पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े करता है। वर्षों तक उच्च जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारियों को यदि उसका उचित लाभ नहीं मिलता, तो इससे पूरी व्यवस्था पर असर पड़ता है।
अब सभी की नजर राज्य सरकार और मध्य प्रदेश पावर ट्रांसमिशन कंपनी प्रबंधन पर टिकी है। यदि न्यायालय के निर्देशों और कर्मचारियों की मांगों के अनुरूप निर्णय लिया जाता है, तो लंबे समय से चले आ रहे इस विवाद का समाधान संभव हो सकता है। वहीं यदि देरी जारी रही, तो आने वाले समय में यह मुद्दा और अधिक बड़ा रूप ले सकता है।











