
ज्योतिष केसरी
श्रीमद्भगवद्गीता में पितरों की मुक्ति से संबंधित विचार गहराई से प्रत्यक्ष रूप से तो नहीं, परोक्ष रूप से अवश्य बताए गए हैं। गीता का मुख्य उद्देश्य जीवात्मा को संसार के बंधन (जन्म–मरण चक्र) से मुक्त कराना और परमात्मा से मिलाना है। इसी सन्दर्भ में पितरों की मुक्ति से जुड़े कई प्रसंग मिलते हैं।
श्रद्धा और यज्ञ द्वारा पितरों की तृप्ति
गीता में यज्ञ, दान और श्रद्धा का महत्व बताया गया है।
अध्याय 9, श्लोक 25:
“यान्ति देवव्रता देवान् पितॄन्यान्ति पितृव्रताः।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्॥”
अर्थ:
जो देवताओं की पूजा करते हैं, वे देवताओं को प्राप्त होते हैं। जो पितरों की आराधना करते हैं, वे पितरों को प्राप्त होते हैं। जो भूत-प्रेत की पूजा करते हैं, वे भूत योनि को प्राप्त होते हैं और जो भगवान की भक्ति करते हैं, वे स्वयं भगवान को प्राप्त होते हैं। इस श्लोक में स्पष्ट है कि पितृभक्ति और श्राद्ध से पितरों को तृप्ति मिलती है और उनकी गति उत्तम होती है।
श्राद्ध और आहुति का महत्व
अध्याय 17 (श्रद्धात्रयविभाग योग) में कहा गया है कि जो भी यज्ञ, दान और तप किया जाता है– यदि वह श्रद्धा से है, तो वह पवित्र होता है और उसका फल पितरों व देवताओं तक पहुँचता है। श्राद्ध का तात्पर्य भी यही है- श्रद्धा से अर्पित अन्न, जल और तर्पण पितरों तक पहुँचकर उन्हें तृप्त करता है और उनकी आत्मा को गति देता है।
पितरों की मुक्ति का सर्वोच्च साधन– भगवान की भक्ति
गीता में बार-बार कहा गया है कि जो भक्त पूर्ण भक्ति के साथ भगवान को याद करता है, उसका कल्याण तो होता ही है, साथ ही उसके पूर्वज पितरों का भी कल्याण होता है।
अध्याय 9, श्लोक 22:
“अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥”
अर्थ:
भगवान स्वयं कहते हैं कि वे भक्त के सारे भार (योगक्षेम) को उठाते हैं। इसमें पितरों की रक्षा और मुक्ति भी सम्मिलित है।
परमपद प्राप्ति और पितरों की गति
अध्याय 8 (अक्षरब्रह्मयोग) में भगवान ने कहा कि जो मनुष्य जीवन के अंत में भगवान को स्मरण करता है, वह परमगति प्राप्त करता है। गीता के भाष्यों में यह व्याख्या मिलती है कि जब कोई भक्त परमपद प्राप्त करता है, तो उसकी सप्त पीढ़ियाँ ऊपर और नीचे पितर और वंशज भी उसका पुण्य पाते हैं और उनका उद्धार होता है।
गीता का मूल संदेश पितरों के संदर्भ में
केवल कर्मकाण्ड से पितरों की मुक्ति सीमित होती है– वे पितृलोक तक पहुँचते हैं। लेकिन सच्ची भक्ति और भगवान का नामस्मरण करने से पितरों की आत्मा भी परम लोक (मोक्ष) की ओर गति कर सकती है। इसलिए गीता पितरों की मुक्ति के लिए दो रास्ते बताती है- पहला श्रद्धा से श्राद्ध, यज्ञ और तर्पण करना और दूसरा भगवद्भक्ति द्वारा परमगति पाना और उस पुण्य का प्रभाव पितरों को देना।
निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि श्रीमद्भगवद्गीता कहती है कि पितरों की शांति और मुक्ति हेतु श्रद्धा से श्राद्ध एवं यज्ञ करने चाहिए, परंतु सर्वोच्च मार्ग है– भगवान की अनन्य भक्ति। जब संतान परमात्मा की शरण लेती है, तो उसके पितर भी पुण्यफल पाते हैं और उन्हें मोक्ष की ओर गति मिलती है।











