Wednesday, April 15, 2026
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शीतला अष्टमी-11 मार्च 2026 : ऐस्ट्रो ऋचा श्रीवास्तव से जाने पूजा-विधि

हिन्दू धर्म में शीतला अष्टमी अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व माना जाता है। यह पर्व मुख्यतः माता शीतला की आराधना के लिए मनाया जाता है, जिन्हें रोगनाशिनी और विशेष रूप से चेचक, ज्वर तथा महामारी आदि संक्रामक रोगों से रक्षा करने वाली देवी माना गया है। भारतीय लोकपरंपरा में शीतला माता को स्वास्थ्य और शुद्धता की अधिष्ठात्री देवी माना गया है।

शीतला माता का स्वरूप और प्रतीक-

पुराणों और लोककथाओं के अनुसार शीतला माता का स्वरूप अत्यंत सरल और प्रतीकात्मक है। वे प्रायः गधे पर सवार दिखाई जाती हैं। उनके हाथ में झाड़ू, नीम की पत्तियाँ और जल से भरा कलश होता है। इन प्रतीकों का गहरा अर्थ है—
झाड़ू : रोग और अशुद्धता को दूर करने का प्रतीक।
नीम की पत्तियाँ : औषधीय और रोगनाशक शक्ति का संकेत।
कलश का जल : शरीर और वातावरण को शीतल तथा पवित्र रखने का संकेत।
लोकमान्यता है कि शीतला माता शरीर और वातावरण को शीतल रखकर रोगों को दूर करती हैं। इसलिए उन्हें “शीतलता की देवी” कहा जाता है।

शीतला अष्टमी क्यों मनाई जाती है-

प्राचीन काल में चेचक जैसे रोग बहुत भयावह माने जाते थे। उस समय चिकित्सा सुविधाएँ सीमित थीं, इसलिए लोग देवी-देवताओं की शरण लेते थे। मान्यता थी कि शीतला माता प्रसन्न हों तो घर-परिवार रोगों से सुरक्षित रहता है।
इसी कारण वर्ष में एक दिन विशेष रूप से माता की पूजा करके उनसे स्वास्थ्य, सुख और संतति की रक्षा की प्रार्थना की जाती है। यह पर्व विशेष रूप से राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात और बिहार में अत्यधिक श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।

बसोड़ा की परंपरा-

शीतला अष्टमी को कई स्थानों पर “बसोड़ा” भी कहा जाता है। इस दिन एक विशेष परंपरा निभाई जाती है—
अष्टमी से एक दिन पहले घर में भोजन बनाया जाता है और अगले दिन उसी ठंडे (बासी) भोजन का भोग माता को लगाया जाता है। इस दिन घर में नया भोजन नहीं पकाया जाता।

इसके पीछे धार्मिक तथा व्यावहारिक दोनों कारण बताए जाते हैं। धार्मिक रूप से इसे माता को प्रसन्न करने की परंपरा माना जाता है, जबकि व्यवहारिक रूप से यह संकेत देता है कि गर्मी के मौसम में स्वच्छता और खान-पान पर विशेष ध्यान रखना चाहिए।

पूजा-विधि-

शीतला अष्टमी के दिन प्रातःकाल स्नान करके माता शीतला की पूजा की जाती है। भक्त मंदिर में जाकर या घर में ही माता की प्रतिमा या चित्र के सामने दीप, धूप और नैवेद्य अर्पित करते हैं।
नीम की पत्तियाँ, हल्दी, चावल, दही और ठंडे पकवानों का भोग लगाया जाता है। महिलाएँ विशेष रूप से परिवार के स्वास्थ्य और बच्चों की रक्षा के लिए माता से प्रार्थना करती हैं।

सन 2026 में शीतला अष्टमी कब है?-

सन 2026 में शीतला अष्टमी 11 मार्च 2026 (बुधवार) को मनाई जाएगी। यह पर्व चैत्र कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को पड़ता है, जो होली के लगभग एक सप्ताह बाद आती है।

शीतला अष्टमी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह स्वच्छता, स्वास्थ्य और प्रकृति के महत्व का भी संदेश देता है। नीम, जल और सफाई के प्रतीक हमें यह याद दिलाते हैं कि रोगों से बचाव के लिए स्वच्छता और प्राकृतिक उपचार कितने महत्वपूर्ण हैं।

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