Homeआस्थाभगवान विश्वकर्मा: सृष्टि के प्रथम अभियंता, देवताओं के दिव्य शिल्पी

भगवान विश्वकर्मा: सृष्टि के प्रथम अभियंता, देवताओं के दिव्य शिल्पी

ऐस्ट्रो ऋचा श्रीवास्तव
ज्योतिष केसरी

हिंदू सनातन परंपरा में भगवान विश्वकर्मा को देवताओं के दिव्य शिल्पी और वास्तुशिल्प के आदिगुरु के रूप में जाना जाता है। वे यांत्रिकी, वास्तु, धातुकर्म और शिल्पकला के अविष्कारक माने जाते हैं।

पुराणों में उनका उल्लेख सृष्टि के प्रथम अभियंता (Engineer) और स्थापत्यकला के जनक के रूप में मिलता है। उन्हें प्रजापति ब्रह्मा का मानस पुत्र तथा सृष्टि में सभी यंत्रों, भवनों और नगरों का निर्माता बताया गया है।

कहा जाता है कि भगवान विश्वकर्मा ने देवताओं के लिए अनेक दिव्य नगरों और महलों का निर्माण किया। उन्होंने इन्द्रपुरी, द्वारका, लंका, हस्तिनापुर और पांडवों के लिए इन्द्रप्रस्थ जैसे नगरों की रचना की। लंका का स्वर्णमंडित महल, जिसे बाद में रावण ने शिवजी की भक्ति से प्राप्त किया, भी उन्हीं की कृति था।

इसके अतिरिक्त उन्होंने इन्द्र का वज्र, विष्णु का सुदर्शन चक्र, शिव का त्रिशूल और कुबेर का पुष्पक विमान जैसे दिव्य आयुध भी बनाए।

भगवान विश्वकर्मा केवल शिल्पकार ही नहीं, बल्कि विज्ञान और कला के सम्मिश्रण के प्रतीक हैं। उनकी कृपा से मनुष्य ने औजार, भवन, वाहन और उद्योगों का विकास करना सीखा। इसलिए उन्हें सभी शिल्पियों, इंजीनियरों, कारीगरों और तकनीकी कर्मियों का अधिष्ठाता देवता माना जाता है।

कब है विश्वकर्मा जयंती

हर वर्ष भाद्रपद शुक्ल पंचमी को विश्वकर्मा जयंती मनाई जाती है। इस वर्ष बुधवार 17 सितंबर को विश्वकर्मा जयंती मनाई जाएगी।

इस दिन कारीगर, उद्योगपति और मजदूर अपने-अपने औजारों व मशीनों की पूजा करते हैं और अपने कार्य की सफलता के लिए विश्वकर्मा देव से आशीर्वाद मांगते हैं। यह परंपरा तकनीकी जगत और श्रम के महत्व को सम्मान देने की अनूठी संस्कृति का परिचायक है।

इस प्रकार भगवान विश्वकर्मा को केवल देवताओं के शिल्पी नहीं, बल्कि सृष्टि के शिल्पकला, स्थापत्य, विज्ञान और यांत्रिकी के अनंत स्रोत के रूप में पूज्य माना जाता है।

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