Friday, April 24, 2026
Homeआस्थाशारदेय नवरात्रि विशेष: द्वितीय दिवस माँ ब्रह्मचारिणी की आराधना

शारदेय नवरात्रि विशेष: द्वितीय दिवस माँ ब्रह्मचारिणी की आराधना

ऐस्ट्रो ऋचा श्रीवास्तव
ज्योतिष केसरी

नवरात्रि के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा होती है। “ब्रह्म” का अर्थ है तप और “चारिणी” का अर्थ है आचरण करने वाली। इस प्रकार ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ- तपस्या और संयम का आचरण करने वाली देवी। वे हाथ में जपमाला और कमंडल धारण करती हैं। उनका स्वरूप अत्यन्त शांत, तेजस्वी और तपस्विनी का है।

कथा एवं जन्म

माता ब्रह्मचारिणी पार्वती का ही शिव से विवाह से पूर्व का रूप हैं।  वे तपस्या में लीन रहकर भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करती हैं। उन्होंने हजारों वर्षों तक कठोर तप किया। कभी केवल फल-फूल पर, तो कभी केवल बिल्वपत्र पर और अंत में निराहार रहकर तपस्या की। उनकी इसी अद्भुत तपस्या से वे ब्रह्मचारिणी नाम से प्रसिद्ध हुईं।

आसन

माता ब्रह्मचारिणी का आसन कमल और तपस्या की शक्ति है। वे किसी भौतिक वाहन पर नहीं, बल्कि अपने तप और संयम की शक्ति से प्रतिष्ठित हैं। इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति धैर्य और संयम के मार्ग पर चलता है, वही जीवन में विजय प्राप्त करता है।

प्रिय रंग

नवरात्रि के दूसरे दिन माता ब्रह्मचारिणी की पूजा करते समय गुलाबी अथवा पीला रंग शुभ माना जाता है। गुलाबी रंग प्रेम और करुणा का प्रतीक है, जबकि पीला रंग ज्ञान और ऊर्जा का। भक्त इन रंगों के वस्त्र धारण करके माता की आराधना करते हैं।

भोग

माता ब्रह्मचारिणी को सादा चीनी और मिश्री अत्यन्त प्रिय है। उनकी पूजा में मिश्री, शक्कर और गुड़ अर्पित किया जाता है। इसके अतिरिक्त पुष्पों में गेंदा और चमेली अर्पित करने से वे प्रसन्न होती हैं।

महिमा एवं महत्व

माता ब्रह्मचारिणी की आराधना से साधक को धैर्य, संयम, आत्मबल और सफलता प्राप्त होती है। वे साधकों को जीवन में कठिनाइयों का सामना करने का साहस देती हैं। कहा जाता है कि उनकी कृपा से साधक की तपस्या सफल होती है और ज्ञान-भक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।

तांत्रिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि

माता ब्रह्मचारिणी का संबंध स्वाधिष्ठान चक्र से माना जाता है। साधना में यह चक्र जाग्रत होने पर साधक के भीतर भक्ति और तप का भाव उत्पन्न होता है। उनकी उपासना से मानसिक स्थिरता, आत्म-शुद्धि और आत्म-नियंत्रण की प्राप्ति होती है।

अतः माता ब्रह्मचारिणी केवल तप और संयम की देवी ही नहीं, बल्कि वे जीवन में आत्मबल और सत्यनिष्ठा की प्रेरणा देती हैं। उनका गुलाबी-पीला रंग, मिश्री का भोग और साधारण पूजा-सामग्री इस बात का प्रतीक है कि वे सादगी, पवित्रता और साधना की अधिष्ठात्री देवी हैं। नवरात्रि के दूसरे दिन उनकी पूजा करने से साधक के जीवन में आत्मविश्वास और शांति का संचार होता है।

Related Articles

Latest News