Friday, April 24, 2026
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‘वंदे मातरम्’ विवाद पर शशि थरूर की राय, देशभक्ति थोपने से नहीं पनपती

कांग्रेस सांसद Shashi Tharoor ने ‘वंदे मातरम्’ को लेकर चल रही बहस पर अपनी स्पष्ट राय रखी है। उनका कहना है कि भारत का राष्ट्रवाद समावेशी होना चाहिए और किसी भी नागरिक को देशभक्ति प्रदर्शित करने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, एक सशक्त लोकतंत्र वही है जहां आस्तिक, असहमत और मौन रहने वाले—सभी नागरिकों के लिए समान स्थान हो।


📜 ‘वंदे मातरम्’ का ऐतिहासिक संदर्भ

‘वंदे मातरम्’ की रचना महान साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान देशभक्ति का प्रमुख प्रतीक बना और क्रांतिकारियों व सत्याग्रहियों को प्रेरित करता रहा।

थरूर ने अपने लेख, जो The Indian Express में प्रकाशित हुआ, में उल्लेख किया कि स्वतंत्रता से पहले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ गाया जाता था।

हालांकि, आजादी के समय भारत की धार्मिक विविधता को ध्यान में रखते हुए ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान और ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया गया। यह निर्णय राष्ट्रवादी इतिहास का सम्मान करने और धार्मिक संवेदनशीलताओं के बीच संतुलन बनाने के उद्देश्य से लिया गया था।


🎼 टैगोर का सुझाव और धार्मिक आपत्तियां

थरूर ने नोबेल पुरस्कार विजेता Rabindranath Tagore की भूमिका का भी जिक्र किया। टैगोर ने 1937 में सुझाव दिया था कि सार्वजनिक कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के केवल पहले दो छंद ही गाए जाएं। उनका मानना था कि शुरुआती छंद मातृभूमि के प्राकृतिक सौंदर्य का प्रतीकात्मक वर्णन करते हैं, जबकि बाद के छंदों में देवी-देवताओं का उल्लेख है, जिससे कुछ धार्मिक समुदायों को आपत्ति हो सकती है।

थरूर के अनुसार, कुछ मुस्लिम समुदायों की आपत्ति इस्लाम के ‘तौहीद’ सिद्धांत से जुड़ी है, जो ईश्वर की एकता पर बल देता है और किसी अन्य सत्ता की उपासना को स्वीकार नहीं करता। ऐसे में गीत के कुछ अंश उनके धार्मिक विश्वासों से टकराते हैं।


⚖️ राज्य और अंतरात्मा के बीच संतुलन

थरूर का तर्क है कि किसी नागरिक को ऐसी स्थिति में डालना, जहां उसे अपनी आस्था और राज्य के बीच चयन करना पड़े, धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की भावना के विपरीत है। देशभक्ति एक स्वाभाविक भावना है, जिसे कानून के जरिए लागू नहीं किया जा सकता।

उनके अनुसार, किसी राष्ट्रीय प्रतीक की वास्तविक शक्ति स्वैच्छिक सम्मान में होती है, न कि बाध्यकारी आदेश में। जबरन निष्ठा का प्रदर्शन वास्तविक देशभक्ति को कमजोर कर सकता है।


🏛️ सुप्रीम कोर्ट के 1986 के फैसले का हवाला

थरूर ने 1986 के एक ऐतिहासिक फैसले का जिक्र किया, जिसमें Supreme Court of India ने कहा था कि राष्ट्रगान के दौरान सम्मानपूर्वक खड़े रहने वाले नागरिक को उसे गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

उन्होंने सुझाव दिया कि यही सिद्धांत ‘वंदे मातरम्’ पर भी लागू होना चाहिए। जो लोग इसके सभी छंद गाना चाहते हैं, उन्हें स्वतंत्रता हो; वहीं जिनकी धार्मिक या वैचारिक आपत्ति है, उन्हें सम्मानपूर्वक मौन रहने का अधिकार मिलना चाहिए। साथ ही, राज्य यह सुनिश्चित करे कि किसी को इस अधिकार के प्रयोग के कारण दंड या सामाजिक भेदभाव का सामना न करना पड़े।


🤝 सह-अस्तित्व ही सच्चा राष्ट्रवाद

अंत में थरूर ने कहा कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में एकता का आधार बाध्यता नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व और पारस्परिक सम्मान है। उनके अनुसार, सच्चा राष्ट्रवाद वही है जो हर नागरिक को अपनी आस्था और अंतरात्मा के अनुरूप देश के प्रति सम्मान व्यक्त करने की स्वतंत्रता देता है।

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