जबलपुर। पमरे के एक दिवंगत कर्मचारी की पत्नी को राहत देते हुए न्यायालय ने महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। दस्तावेजों में नाम की भिन्नता को आधार बनाकर रेलवे प्रशासन द्वारा रोकी गई भुगतान राशि को अब जारी करने का मार्ग प्रशस्त हो गया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि विवाह के पश्चात सरनेम बदलने की स्थिति में सभी नामों को एक ही व्यक्ति का माना जाना चाहिए। इस प्रकरण का निपटारा लगभग 16 माह की अवधि में पूर्ण हुआ है।
सेवा निवृत्त लाभों के लिए कानूनी लड़ाई
प्रकरण की पृष्ठभूमि के अनुसार पश्चिम मध्य रेलवे के जबलपुर मंडल में टेक्नीशियन-1 के पद पर पदस्थ कर्मचारी का निधन 15 जुलाई 2024 को हो गया था। उनके निधन के बाद जब उनकी पत्नी ने अंतिम भुगतान और अन्य सेवा लाभों के लिए आवेदन किया, तो विभागीय प्रक्रिया में अड़चन पैदा हो गई।
रेलवे प्रशासन ने दस्तावेजों की जांच के दौरान पाया कि वादिनी के विभिन्न कागजातों में नामों में अंतर है। इसी तकनीकी कारण का हवाला देते हुए विभाग ने भुगतान रोकने का निर्णय लिया और वादिनी को निर्देशित किया कि वह न्यायालय से इस संबंध में आधिकारिक घोषणा लेकर आए।
साक्ष्यों के आधार पर दावों का निराकरण
न्यायालय की कार्यवाही के दौरान वादिनी के अधिवक्ता शिवम गुप्ता ने पक्ष रखते हुए स्पष्ट किया कि दस्तावेजों में दिखाई देने वाला अंतर मात्र विवाह के उपरांत सरनेम में हुए बदलाव के कारण है। अदालत के समक्ष इस दावे की पुष्टि के लिए नोटराइज्ड शपथ पत्र और अन्य पूरक साक्ष्य प्रस्तुत किए गए।
हालांकि रेलवे की ओर से तर्क दिया गया था कि विवाह से संबंधित पर्याप्त दस्तावेजों के अभाव और नामों की विसंगति के कारण इस वाद को निरस्त किया जाना चाहिए। सभी पक्षों के तर्कों और उपलब्ध प्रमाणों का सूक्ष्म अवलोकन करने के बाद तृतीय व्यवहार न्यायाधीश, कनिष्ठ खंड, जबलपुर रिशा अहमद कुरैशी ने 18 मार्च 2026 को अपना फैसला सुनाया।
अदालत ने वादिनी के सभी अलग-अलग नामों को एक ही व्यक्ति का घोषित करते हुए उन्हें वैधानिक मान्यता प्रदान की। इसके साथ ही रेलवे को आदेश दिया गया कि वे भुगतान की शेष प्रक्रिया को अविलंब पूर्ण करें और इस कानूनी वाद में हुए संपूर्ण व्यय का वहन भी रेलवे प्रशासन द्वारा ही किया जाए।











