Satluj : अभिनेता दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटाए जाने के बाद फिल्म की विभिन्न स्थानों पर कथित तौर पर अवैध सार्वजनिक स्क्रीनिंग का मामला अब पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट पहुंच गया है। इस संबंध में एक अधिवक्ता ने मुख्य न्यायाधीश के समक्ष याचिका दायर कर बिना अनुमति हो रही स्क्रीनिंग पर तत्काल रोक लगाने, जिम्मेदार लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने और कानून के तहत सख्त कार्रवाई की मांग की है। इस मामले ने फिल्म की स्क्रीनिंग, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून-व्यवस्था को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
जानकारी के अनुसार फिल्म सतलुज, जिसे पहले पंजाब ’95 के नाम से जाना जाता था, लंबे इंतजार के बाद 3 जुलाई को ओटीटी प्लेटफॉर्म ज़ी5 पर रिलीज हुई थी. हालांकि रिलीज के कुछ ही समय बाद फिल्म को प्लेटफॉर्म से हटा लिया गया. इसके बावजूद पंजाब और जम्मू सहित कई स्थानों पर फिल्म की सार्वजनिक स्क्रीनिंग किए जाने की खबरें सामने आईं. इन आयोजनों को लेकर अब कानूनी विवाद गहरा गया है.
अधिवक्ता विनीत जिंदल ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र याचिका भेजकर आरोप लगाया है कि कुछ व्यक्तियों, धार्मिक संगठनों और राजनीतिक समूहों द्वारा फिल्म की अवैध सार्वजनिक स्क्रीनिंग आयोजित की जा रही है. याचिका में कहा गया है कि इस तरह के आयोजन कानून का उल्लंघन हैं और इनका इस्तेमाल समाज में तनाव पैदा करने, हिंसा को बढ़ावा देने तथा एक समुदाय और सुरक्षा एजेंसियों के खिलाफ नफरत फैलाने के लिए किया जा सकता है.
याचिका में यह भी कहा गया है कि यदि समय रहते ऐसे आयोजनों पर रोक नहीं लगाई गई तो इससे पंजाब में शांति, सार्वजनिक व्यवस्था और सांप्रदायिक सौहार्द प्रभावित हो सकता है. इसी आधार पर हाईकोर्ट से अनुरोध किया गया है कि संबंधित प्रशासन और पुलिस अधिकारियों को आवश्यक निर्देश जारी किए जाएं ताकि बिना वैध अनुमति के फिल्म का सार्वजनिक प्रदर्शन रोका जा सके.
अधिवक्ता विनीत जिंदल ने अपने सोशल मीडिया मंच एक्स पर भी याचिका की प्रति साझा करते हुए कहा कि उन्होंने अदालत से ऐसे सभी लोगों के खिलाफ उचित कार्रवाई की मांग की है जो फिल्म की अवैध स्क्रीनिंग में शामिल हैं. उनका कहना है कि किसी भी फिल्म का सार्वजनिक प्रदर्शन तभी किया जा सकता है जब वह निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत अधिकृत हो. यदि फिल्म को आधिकारिक रूप से प्रदर्शित करने की अनुमति नहीं है, तो उसकी सार्वजनिक स्क्रीनिंग कानून के विरुद्ध मानी जाएगी.
उन्होंने एक वीडियो संदेश जारी कर भी इस मुद्दे पर अपनी बात रखी. वीडियो में उन्होंने कहा कि बिना वैधानिक अनुमति के किसी फिल्म की सार्वजनिक स्क्रीनिंग करना गैरकानूनी है और संबंधित आयोजकों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की जानी चाहिए. उन्होंने पुलिस प्रशासन से भी अपील की कि कानून का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ तुरंत कार्रवाई की जाए ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो.
उधर, फिल्म को हटाए जाने के बाद ज़ी5 ने भी आधिकारिक बयान जारी किया था. प्लेटफॉर्म ने कहा था कि वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए सतलुज को भारत में अगले आदेश तक उपलब्ध नहीं कराया जाएगा. कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया कि वह सभी कानूनी और उचित प्रक्रियाओं के माध्यम से फिल्म को दोबारा दर्शकों तक पहुंचाने के प्रयास कर रही है. साथ ही उसने फिल्म निर्माताओं और रचनात्मक अभिव्यक्ति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई.
ज़ी5 ने दर्शकों से यह अपील भी की थी कि फिल्म को किसी भी अवैध माध्यम से न देखें और न ही उसकी सार्वजनिक स्क्रीनिंग आयोजित करें. प्लेटफॉर्म ने कहा कि वह फिल्म को दोबारा उपलब्ध कराने के लिए लगातार प्रयासरत है और दर्शकों से धैर्य बनाए रखने का अनुरोध किया. इसके बावजूद कई स्थानों पर कथित तौर पर फिल्म के सार्वजनिक प्रदर्शन की खबरों ने विवाद को और बढ़ा दिया.
बताया जा रहा है कि शुरुआत में फिल्म को केवल भारत में स्ट्रीमिंग से हटाया गया था, लेकिन बाद में इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्लेटफॉर्म से हटा लिया गया. फिल्म के निर्देशक हनी त्रेहन ने भी पुष्टि की कि अब यह भारत के साथ-साथ विदेशों में भी स्ट्रीमिंग के लिए उपलब्ध नहीं है. इस घटनाक्रम के बाद फिल्म को लेकर दर्शकों और फिल्म जगत में चर्चा लगातार बनी हुई है.
सतलुज मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और उनके संघर्ष पर आधारित फिल्म है. खालड़ा ने पंजाब में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों से जुड़े मामलों को उजागर किया था और बाद में उनकी रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गई थी. इसी संवेदनशील विषय पर आधारित होने के कारण फिल्म लंबे समय से चर्चा और विवाद का विषय बनी हुई थी.
फिल्म को रिलीज होने में तीन वर्ष से अधिक का समय लगा. विभिन्न कानूनी और प्रक्रियागत कारणों के चलते इसकी रिलीज कई बार टलती रही. आखिरकार जब यह ओटीटी प्लेटफॉर्म पर आई तो कुछ ही समय बाद इसे हटा लिया गया, जिससे दर्शकों में निराशा फैल गई. इसके बाद अलग-अलग स्थानों पर कथित सार्वजनिक स्क्रीनिंग की खबरें सामने आने लगीं.
अब हाईकोर्ट में दायर याचिका के बाद इस पूरे मामले पर कानूनी प्रक्रिया तेज होने की संभावना है. यदि अदालत इस याचिका पर सुनवाई स्वीकार करती है तो राज्य सरकार, पुलिस प्रशासन और संबंधित पक्षों से जवाब मांगा जा सकता है. साथ ही यह भी स्पष्ट हो सकता है कि फिल्म की सार्वजनिक स्क्रीनिंग से जुड़े मामलों में कानून का पालन किस प्रकार सुनिश्चित किया जाएगा.
फिलहाल पूरे मामले पर फिल्म निर्माता, ओटीटी प्लेटफॉर्म, प्रशासन और न्यायालय की अगली कार्रवाई पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं. वहीं दर्शक भी इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि फिल्म सतलुज दोबारा कानूनी रूप से कब और किस माध्यम से उपलब्ध होगी. दूसरी ओर, अवैध स्क्रीनिंग के आरोपों ने इस फिल्म को एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया है.








