नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल सरकार के ‘एंटी-गुंडा बिल’ को लेकर बड़ा अपडेट सामने आया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने बिल पर मंजूरी देने के बजाय इसे पुनर्विचार के लिए राज्य सरकार को वापस भेज दिया है। केंद्र की ओर से उठाई गई आपत्ति का मुख्य मुद्दा प्रस्तावित कानून की कुछ धाराओं और नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (NDPS) एक्ट, 1985 के बीच संभावित टकराव है। रिपोर्टों के मुताबिक, बिल में मादक पदार्थों से जुड़े अपराधों को लेकर ऐसी व्यवस्था का प्रावधान है, जो केंद्रीय PITNDPS Act, 1988 में मौजूद निवारक हिरासत संबंधी प्रावधानों से ओवरलैप कर सकती है। इसी संभावित कानूनी टकराव के चलते संविधान के अनुच्छेद 254 के तहत आपत्ति का मुद्दा उठाया गया है। राष्ट्रपति की मंजूरी नहीं मिलने के कारण बिल को फिलहाल संशोधन और पुनर्विचार की प्रक्रिया से गुजरना होगा।
बिल वापस होने से पहले केंद्र ने क्या जताई आपत्ति?
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा बिल को पुनर्विचार के लिए लौटाए जाने से पहले केंद्र सरकार ने इसके एक प्रावधान पर कानूनी आपत्ति जताई थी। केंद्र के अनुसार, प्रस्तावित बिल की धारा 2(d)(iii)(B) में NDPS Act, 1985 के तहत अपराध करने, उसका प्रयास करने, उकसाने, बढ़ावा देने, वित्तीय मदद करने या सहयोग करने वाले व्यक्ति को ‘गुंडा’ की परिभाषा में शामिल किया गया था। केंद्र का कहना था कि यह प्रावधान PITNDPS Act, 1988 के तहत पहले से मौजूद निवारक हिरासत की व्यवस्था से ओवरलैप कर सकता है और इससे केंद्रीय कानून के साथ टकराव यानी संविधान के अनुच्छेद 254 के तहत ‘repugnancy’ का सवाल उठ सकता है। इसी वजह से केंद्र ने NDPS से जुड़े इस प्रावधान को बिल से हटाने का सुझाव दिया।
संशोधन के बाद फिर राष्ट्रपति के पास जाएगा बिल
राज्य प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, सरकार बिल में केंद्रीय कानून से टकराने या ओवरलैप करने वाले प्रावधानों में जरूरी बदलाव करने के बाद इसे दोबारा विधानसभा में पेश कर सकती है। संशोधित बिल को विधानसभा से पारित कराने के बाद राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए फिर भेजे जाने का प्रावधान है।
बिल में क्या हैं प्रमुख प्रावधान?
West Bengal Public Safety and Control of Anti-Social Activities Bill, 2026 में ‘असामाजिक गतिविधि’ और ‘गुंडा’ की परिभाषा तय करने के साथ कुछ सख्त प्रशासनिक उपायों का प्रस्ताव किया गया था। इसके तहत जिला मजिस्ट्रेट, पुलिस कमिश्नर या राज्य सरकार द्वारा अधिकृत DIG स्तर के अधिकारी को किसी व्यक्ति के असामाजिक गतिविधियों में शामिल होने या भविष्य में शामिल होने की आशंका होने पर उसे किसी निर्दिष्ट क्षेत्र, जिले या जिलों से बाहर जाने का आदेश देने का अधिकार प्रस्तावित था। साथ ही, ऐसे व्यक्ति को एक साल तक संबंधित क्षेत्र में दोबारा प्रवेश करने से रोकने और उसकी गतिविधियों की रिपोर्ट देने जैसी शर्तें भी लगाई जा सकती थीं।
कलकत्ता हाईकोर्ट में भी हुई थी चुनौती
इस बिल को लेकर कलकत्ता हाईकोर्ट में तीन जनहित याचिकाएं दायर की गई थीं। 6 अगस्त को डिवीजन बेंच ने इन्हें यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उस समय बिल को राष्ट्रपति की मंजूरी नहीं मिली थी और इसलिए उसे चुनौती देने वाली याचिकाएं समय से पहले (premature) थीं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने और बिल के कानून बनने के बाद याचिकाकर्ताओं को इसकी वैधता को चुनौती देने की स्वतंत्रता होगी।








