Friday, September 25, 2026
HomeबॉलीवुडThe Vvaan Review: आस्था बनाम लालच की कहानी में सिद्धार्थ-तमन्ना की केमिस्ट्री...

The Vvaan Review: आस्था बनाम लालच की कहानी में सिद्धार्थ-तमन्ना की केमिस्ट्री बनी जान

बॉलीवुड में लोककथाओं, स्थानीय मान्यताओं और सुपरनैचुरल कहानियों का सिलसिला लगातार देखने को मिल रहा है. ‘स्त्री’, ‘मुंज्या’ और ‘कांतारा’ जैसी फिल्मों ने यह साबित किया है कि भारतीय लोकविश्वासों को आधुनिक सिनेमा की भाषा में पेश किया जाए तो दर्शकों की दिलचस्पी बढ़ सकती है. इसी कड़ी में निर्देशक दीपक कुमार मिश्रा की फिल्म ‘द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ उत्तराखंड की वन देवी से जुड़ी लोककथा को कहानी का आधार बनाती है.

फिल्म आस्था और अंधविश्वास के साथ-साथ इंसान के लालच और प्रकृति के दोहन जैसे मुद्दों को भी छूती है. विचार दिलचस्प है, लेकिन क्या फिल्म इस कहानी को अंत तक उतनी मजबूती से संभाल पाती है? यही इसकी सबसे बड़ी कसौटी है.

क्या है ‘द वन’ की कहानी?
फिल्म की कहानी ऋषि (सिद्धार्थ मल्होत्रा) और ममता (तमन्ना भाटिया) के इर्द-गिर्द घूमती है. मुंबई में रहने वाला यह दंपती माता-पिता बनने की कोशिश कर रहा है, लेकिन लंबे समय से उनकी इच्छा पूरी नहीं हो रही.

छठ पूजा के अवसर पर दोनों अपने पुश्तैनी गांव पहुंचते हैं. वहां ऋषि के भाई-भाभी और उनके बच्चे रहते हैं. उनके साथ ब्लॉगर वेद (मनीष पॉल) भी मौजूद है. गांव में पहुंचने के बाद ऋषि को पता चलता है कि यहां जंगल और उससे जुड़ी सदियों पुरानी मान्यताओं का आज भी गहरा प्रभाव है.

गांव के जंगल में सूर्यास्त के बाद जाना मना है. ऋषि इन नियमों को अंधविश्वास समझता है और इनका मजाक भी उड़ाता है.

इसी बीच जंगल के एक हिस्से को काटकर रास्ता बनाने की कोशिश होती है. गांव के लोग इसका विरोध करते हैं और इसे पवित्र भूमि से छेड़छाड़ मानते हैं. दूसरी ओर ऋषि भी जंगल से सटी अपनी जमीन को बेचने की योजना बना रहा है.

जब ऋषि सूर्यास्त के बाद जंगल में प्रवेश करता है, तो घटनाएं अचानक रहस्यमय मोड़ लेती हैं. जिन बातों को वह अंधविश्वास समझ रहा था, उनके पीछे कोई गहरा सच है या नहीं, फिल्म इसी रहस्य को धीरे-धीरे सामने लाती है.

फर्स्ट हाफ बांधता है ध्यान
फिल्म की शुरुआत में निर्देशक कहानी के माहौल और किरदारों को स्थापित करने में समय लेते हैं. परिवार, गांव, प्रकृति और स्थानीय मान्यताओं के बीच कहानी धीरे-धीरे आगे बढ़ती है.

शुरुआती हिस्से में सबसे बड़ा सवाल यही बना रहता है कि आखिर सूर्यास्त के बाद जंगल में जाने पर इतनी पाबंदी क्यों है. फिल्म इस रहस्य को तुरंत खोलने के बजाय दर्शकों की उत्सुकता बनाए रखती है.

हालांकि, कहानी की रफ्तार कुछ जगह धीमी महसूस होती है, लेकिन वातावरण और रहस्य दर्शक को फिल्म से जोड़े रखते हैं.

सेकंड हाफ में कमजोर पड़ती कहानी
फिल्म की असली समस्या दूसरे हिस्से में सामने आती है. जहां फर्स्ट हाफ अपेक्षाकृत सहज और नियंत्रित लगता है, वहीं सेकंड हाफ में कहानी कई दिशाओं में जाती दिखाई देती है.

रहस्य खुलने शुरू होते हैं, लेकिन स्क्रीनप्ले की कसावट कम हो जाती है. कुछ घटनाएं मनोरंजन करती हैं, जबकि कुछ हिस्से कहानी की गति को प्रभावित करते हैं.

फिल्म का सबसे दिलचस्प पहलू विकास और पुरानी मान्यताओं के बीच टकराव के साथ मानवीय लालच को जोड़ना है. प्रकृति के साथ छेड़छाड़ और उसके परिणामों को कहानी में शामिल करना फिल्म को सिर्फ हॉरर तक सीमित नहीं रहने देता.

हॉरर, VFX और कॉमेडी का कैसा है संतुलन?
मनु आनंद की सिनेमैटोग्राफी जंगल के रहस्यमय माहौल को अच्छी तरह सामने लाती है. जंगल, अंधेरा और वहां होने वाली रहस्यमयी घटनाएं फिल्म के वातावरण को मजबूत करते हैं.

मनीष पॉल और सुलभा आर्या के हिस्से कहानी में हल्के-फुल्के हास्य के पल लेकर आते हैं. रहस्यमयी बाघ, बैल, देवी और नकारात्मक शक्तियों से जुड़े VFX दृश्यों में भी कुछ सीक्वेंस प्रभाव छोड़ते हैं.

हालांकि, सेट डिजाइन और विजुअल ट्रीटमेंट में कुछ जगह और बेहतर काम की गुंजाइश महसूस होती है.

क्लाइमैक्स नहीं छोड़ता उम्मीद के मुताबिक असर
फिल्म के अंत में देवी की स्थापना से जुड़ी बैकस्टोरी सामने आती है. यह हिस्सा कहानी के लिए अहम है, लेकिन जिस तरह इसे जोड़ा गया है, वह पूरी तरह स्वाभाविक नहीं लगता.

कई रहस्यों के जवाब मिलने के बावजूद क्लाइमैक्स उस स्तर का प्रभाव पैदा नहीं कर पाता, जिसकी फिल्म शुरुआत में उम्मीद जगाती है. यही कमजोर कड़ी फिल्म के ओवरऑल अनुभव को प्रभावित करती है.

सिद्धार्थ-तमन्ना की जोड़ी ने जीता दिल
अभिनय फिल्म की मजबूत कड़ियों में शामिल है. सिद्धार्थ मल्होत्रा ने ऋषि के किरदार में अच्छा काम किया है. शुरुआत में हर चीज को तर्क और अंधविश्वास की नजर से देखने वाले किरदार के भीतर धीरे-धीरे होने वाले बदलाव को उन्होंने सहजता से निभाया है.

तमन्ना भाटिया फिल्म के भावनात्मक पक्ष को मजबूती देती हैं. सिद्धार्थ और तमन्ना की ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री स्वाभाविक लगती है और दोनों की जोड़ी फिल्म में ताजगी लेकर आती है.

सुनील ग्रोवर नकारात्मक भूमिका में प्रभावी नजर आते हैं. अनूप सोनी और श्वेता तिवारी ने भी अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया है. वहीं मनीष पॉल का कॉमिक अंदाज कहानी में मनोरंजन का तड़का लगाता है.

संगीत भी देता है साथ
फिल्म में कई संगीतकारों का योगदान है. ‘समझो ना’, ‘ठुमक ठुमक’ और ‘छठी मैया’ जैसे गाने कहानी के माहौल के साथ फिट बैठते हैं और फिल्म के संगीत पक्ष को मजबूत करते हैं.

The Vvaan Review
‘द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ के पास एक दिलचस्प लोककथा, मजबूत कलाकार और आस्था बनाम अंधविश्वास के साथ प्रकृति और इंसानी लालच को जोड़ने वाला विचार है. फिल्म का पहला हिस्सा रहस्य बनाए रखने में कामयाब रहता है, लेकिन दूसरे भाग में स्क्रीनप्ले बिखरने लगता है.

सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया की केमिस्ट्री फिल्म की खासियत है, जबकि सुनील ग्रोवर समेत सपोर्टिंग कास्ट ने भी अच्छा साथ दिया है. हालांकि कमजोर पड़ता सेकंड हाफ और अपेक्षाकृत कम प्रभावी क्लाइमैक्स फिल्म को एक यादगार अनुभव बनने से रोकते हैं.

Related Articles

Latest News