Tuesday, March 10, 2026
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माँ कूष्माण्डा: सृष्टि की आदि शक्ति

ऐस्ट्रो ऋचा श्रीवास्तव
ज्योतिष केसरी

नवरात्रि की चतुर्थी के दिन माँ कूष्माण्डा का पूजन होता है। इनका नाम ही इनके स्वरूप और कार्य का द्योतक है। “कूष्माण्डा” शब्द तीन भागों से मिलकर बना है– कु (थोड़ा), उष्मा (ऊर्जा) और अण्ड (ब्रह्माण्ड)। अर्थात् जिनके हल्के से स्मित (मुस्कान) से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई, वे हैं माता कूष्माण्डा। इन्हें सृष्टि की आदि जननी और आदि शक्ति माना जाता है।

माँ का स्वरूप

माँ कूष्माण्डा का तेज और आभा सूर्य के समान है। वे आठ भुजाओं से युक्त हैं, इसलिए इन्हें अष्टभुजा देवी भी कहते हैं। उनके हाथों में कमल, धनुष-बाण, अमृत कलश, चक्र, गदा, कमण्डल और माला होती है। वे सिंह पर सवार रहती हैं। उनका मुखमण्डल दिव्य और अत्यंत तेजस्वी है।

प्रिय भोग

माँ कूष्माण्डा को मालपुआ और कद्दू (कूष्माण्ड) का भोग प्रिय है। इसी कारण उनका नाम कूष्माण्डा भी पड़ा। भक्त उन्हें मालपुआ अर्पित करके सुख-समृद्धि और आरोग्य की कामना करते हैं।

प्रिय रंग

माँ कूष्माण्डा का प्रिय रंग नारंगी (संतरी) है। यह रंग ऊर्जा, उत्साह और सकारात्मकता का प्रतीक है। नवरात्रि के चौथे दिन नारंगी वस्त्र धारण करके इनकी पूजा करना अत्यंत शुभ फलदायी माना जाता है।

कुंडली चक्र में स्थान

माँ कूष्माण्डा का संबंध अनाहत चक्र (हृदय चक्र) से है। यह चक्र प्रेम, दया, करुणा और संतुलन का प्रतीक है। माता की उपासना से साधक के भीतर का भय और नकारात्मकता समाप्त होती है। इस चक्र के जागरण से आत्मबल, स्वास्थ्य और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है।

महिमा और महत्व

पौराणिक कथाओं के अनुसार जब ब्रह्माण्ड चारों ओर अंधकार से ढका हुआ था, तब माँ कूष्माण्डा ने अपनी दिव्य हंसी से ब्रह्माण्ड का निर्माण किया। वे ही सूर्य मण्डल के भीतर निवास करती हैं और सम्पूर्ण सृष्टि को जीवनदायिनी ऊर्जा प्रदान करती हैं। माँ की पूजा से भक्त को दीर्घायु, स्वास्थ्य और शक्ति प्राप्त होती है। वे असाध्य रोगों का नाश करती हैं और साधक के जीवन में प्रकाश और उत्साह भरती हैं। उनकी कृपा से साधक के भीतर की नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है और उसका हृदय शुद्ध एवं निर्मल बनता है।

कथा

देवी भागवत और मार्कण्डेय पुराण में वर्णित है कि जब सृष्टि का प्रारम्भ होना था, तब सब ओर अंधकार व्याप्त था। कोई सृजन शक्ति प्रकट नहीं हो रही थी। तब माँ ने अपनी मुस्कान से अण्ड (ब्रह्माण्ड) का निर्माण किया और उसमें जीवन का संचार किया। इसलिए उन्हें सृष्टि की प्रथम सर्जक और आदिशक्ति कहा गया। माता कूष्माण्डा की उपासना से साधक के भीतर आत्मबल जागृत होता है और उसे जीवन की प्रत्येक कठिनाई का सामना करने की शक्ति प्राप्त होती है। वे ही सृष्टि की आदिजन्मा हैं और ब्रह्माण्ड की पालनकर्ता भी।

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