Monday, March 16, 2026
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नवरात्रि षष्टी: महिषासुरमर्दिनी माँ कात्यायनी

ऐस्ट्रो ऋचा श्रीवास्तव
ज्योतिष केसरी

नवरात्रि के छठे दिन माँ कात्यायनी की आराधना की जाती है। वे शक्ति के नौ स्वरूपों में छठा रूप हैं और महिषासुर का वध करने के कारण महिषासुरमर्दिनी के नाम से प्रसिद्ध हैं। माँ कात्यायनी का तेज, पराक्रम और करुणा, भक्तों को धर्म और सत्य की ओर प्रेरित करता है।

उत्पत्ति

महिषासुर ने कठोर तप करके ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त किया था कि कोई देवता या पुरुष उसका वध नहीं कर सकेगा। इस वरदान के बल पर उसने तीनों लोकों पर अत्याचार आरंभ कर दिया। तब ब्रह्मा, विष्णु और शिव ने मिलकर एक अद्भुत तेज उत्पन्न किया। उसी तेज से एक दिव्य नारी प्रकट हुई। ऋषि कात्यायन ने तप के प्रभाव से उस देवी को अपने घर प्रकट किया और उन्हें अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया। इसलिए उनका नाम पड़ा कात्यायनी। अंततः देवी ने सिंह पर आरूढ़ होकर महिषासुर का वध किया और देवताओं को भयमुक्त किया।

स्वरूप

माँ कात्यायनी चार भुजाओं वाली हैं। उनके एक हाथ में कमल, दूसरे हाथ में तलवार है। अन्य दो हाथों में वे अभय और वरद मुद्रा में रहती हैं। उनका स्वरूप अत्यंत तेजोमय है और वे सिंह पर आरूढ़ होती हैं। सिंह उनके पराक्रम और निडरता का प्रतीक है।

प्रिय रंग

माँ कात्यायनी को पीला और सुनहरा रंग प्रिय है। यह रंग ज्ञान, ऊर्जा और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। भक्त नवरात्रि के छठे दिन पीले या सुनहरे वस्त्र धारण करके उनकी पूजा करते हैं।

प्रिय भोग

माँ कात्यायनी को शहद अर्पित करना शुभ माना जाता है। शहद उनके प्रिय भोगों में प्रमुख है। यह भोग जीवन में मधुरता, सौहार्द और संतुलन लाता है। कुछ स्थानों पर उन्हें लाल फल, विशेषकर अनार अर्पित करने का भी विधान है।

ग्रह और ज्योतिषीय महत्व

ज्योतिषशास्त्र में माँ कात्यायनी का संबंध ग्रह बृहस्पति (गुरु) से माना जाता है। बृहस्पति ज्ञान, धर्म, विवाह और भाग्य का कारक ग्रह है। जिनकी कुण्डली में बृहस्पति अशुभ स्थिति में होता है या जिनके विवाह में बाधाएं आती हैं, उनके लिए माँ कात्यायनी की आराधना अत्यंत फलदायी सिद्ध होती है। भागवत पुराण में वर्णित है कि वृंदावन की गोपियों ने भगवान कृष्ण को पति रूप में पाने के लिए यमुना तट पर कात्यायनी व्रत किया था। इसीलिए यह व्रत विवाह योग्य कन्याओं के लिए विशेष महत्व रखता है।

कुण्डलिनी और चक्र

योगशास्त्र में माँ कात्यायनी का संबंध आज्ञा चक्र (दोनों भौंहों के बीच का स्थान) से माना जाता है। यह चक्र ज्ञान, अंतर्दृष्टि और आध्यात्मिक जागरण का केंद्र है। माँ कात्यायनी की उपासना से आज्ञा चक्र जागृत होता है। इससे व्यक्ति को सही-गलत का विवेक और आत्मविश्वास प्राप्त होता है। साधक को मानसिक शांति, अंतर्दृष्टि और आध्यात्मिक प्रगति का आशीर्वाद मिलता है।

महिमा

माँ कात्यायनी धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए सदैव तत्पर रहती हैं। उनकी महिमा इस प्रकार है- वे दुष्टों का नाश और सज्जनों की रक्षा करती हैं। विवाह और दांपत्य जीवन की बाधाएं दूर करती हैं। साधक को साहस, शक्ति और आत्मबल प्रदान करती हैं।

योग मार्ग पर चलने वालों की कुण्डलिनी शक्ति को जागृत करती हैं। उनके आशीर्वाद से व्यक्ति के जीवन में ज्ञान, विजय और आध्यात्मिक उत्थान का संचार होता है। माँ कात्यायनी केवल पराक्रम और शक्ति की प्रतीक नहीं, बल्कि ज्ञान, प्रेम और धर्म की अधिष्ठात्री भी हैं। उनका वाहन सिंह, प्रिय रंग पीला और प्रिय भोग शहद है। ज्योतिषीय दृष्टि से वे बृहस्पति ग्रह की अधिष्ठात्री हैं और योगशास्त्र में वे आज्ञा चक्र की शासक मानी जाती हैं। नवरात्रि के छठे दिन श्रद्धापूर्वक उनकी पूजा करने से भक्तों को जीवन की कठिनाइयों से मुक्ति, विवाह में सफलता और आध्यात्मिक जागरण का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

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