
स्वतंत्रत रचनाकार,
शिक्षिका सनराइज एकेडमी,
नई दिल्ली, भारत
नवरात्रि का पर्व हमारे देश में वैदिक काल से भी पहले से मनाया जाने वाला पर्व है। नवरात्रि के दौरान नौ दिन तक माँ दुर्गा के विभिन्न रूपों की पूजा की जाती है, जिन्हें ‘नवदुर्गा’ कहा जाता है। इस पर्व का धार्मिक महत्व बहुत बड़ा है। यह पर्व विशेष रूप से भारत में मनाया जाता है। इन दिनों प्रत्येक दिन मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरुपों का आह्वान किया जाता है और मां भगवती की विशेष रूप से आराधना की जाती है। मां दुर्गा की उपासना मनुष्य ही नहीं देव-असुर, ऋषि-मुनि, यक्ष-गंधर्व, और किन्नर भी करते हैं। नवरात्रि का अर्थ है नौ रात्रियां या नौ रातें। इन्हीं नौ रात्रियों व दस दिनों में पूरे भारत में अलग अलग रीतियों से शक्ति की आराधना करने की परंपरा रही है।
नवरात्रि की नौ रात्रियों में मुख्यतः मां दुर्गा के तीन रूपों महालक्ष्मी, महाकाली व महासरस्वती की पूजा अर्चना की जाती है। मां दुर्गा की आराधना की मुख्य पुस्तक ‘श्री दुर्गा सप्तशती’ है जिसे ऋग्वेद का अंश माना जाता है। माता के नौ रूपों की आराधना करने से भक्तों को शक्ति, साहस और समृद्धि की प्राप्ति होती है। माता के नौ स्वरूपों का महापर्व विशेष महत्व रखता है। नवरात्रि मां दुर्गा की पूजा का एक महत्वपूर्ण पर्व है। मुख्य रूप से नवरात्रि वर्ष में दो बार मनाई जाती है। प्रथम चैत्र मास (मार्च-अप्रैल) के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तिथि तक मनाई जाती है, जिसे चैत्रीय नवरात्रि कहा जाता है। इसी नवमी तिथि को देश भर में रामनवमी मनाई जाती है। उस समय विक्रम संवत पर आधारित हिंदू नव वर्ष भी प्रारम्भ होता है। दूसरी नवरात्रि अश्विन माह (सितंबर-अक्टूबर) में पितृ पक्ष के बाद प्रारम्भ होती है। यह नवरात्रि शारदीय नवरात्रि के नाम से जानी जाती है, क्योंकि इसी नवरात्रि से शरद ऋतु का आगमन भी होता है।
एक धार्मिक मान्यता के अनुसार इन्हीं नौ दिनों में माता दुर्गा धरती पर आती हैं, क्योंकि कहा जाता है धरती उनका मायका है। शक्ति स्वरूपा माता रानी के धरती पर आने की खुशी में पूरे देश मे उत्सव मनाया जाता है। और दसवें दिन विजयादशमी के शुभ दिन वे विदा ले लेती हैं। विदाई का वह क्षण भक्तों के लिए बहुत ही भावुक करने वाला हो जाता है। अश्रुपूर्ण आंखों से उन्हें विदा करने के बाद इस महापर्व का समापन हो जाता है। नवरात्रि का यह धार्मिक अनुष्ठान भारत के विभिन्न भागों में अलग अलग ढंग से मनाया जाता है। गुजरात में नवरात्रों में डांडिया व गरबा नृत्य करने की परंपरा है। बंगाल में मुख्यतः शारदीय नवरात्रि में महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमा स्थापित की जाती है। दशमी के दिन सिंदूर खेला नृत्य व विशेष आरती की जाती है। बंगाल के पंडालों की तरह ही बिहार में भी मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की जाती है। कलश स्थापना के बाद विधि विधान से पूजा की जाती है और सप्तमी के दिन माता के नेत्र खुलने के बाद भक्तों के दर्शन के लिए प्रतिमा का अनावरण किया जाता है। माता की उपस्थिति से पूरा माहौल भव्य और दिव्य हो जाता है। उत्तर भारत में नवरात्रि में कलश स्थापना करने की परंपरा है, व्रत उपवास रखे जाते हैं, पुरोहितों द्वारा हवन पूजन करवाया जाता है। उसके बाद अष्टमी व नवमी के दिन कन्या पूजन की जाती है। नवरात्रों में व्रत का आध्यात्मिक महत्व यह है कि पहले तीन दिन के व्रत से सतोगुण का शमन होता है। जिससे सत्व में वृद्धि से शरीर हल्का होने के साथ साथ ऊर्जावान हो जाता है। दूसरे तीन दिन के व्रत से रजोगुण की निवृत्ति होती है। अंतिम तीन दिन में उपवास के द्वारा तमोगुण पर विजय प्राप्त की जाती है। इसलिए अपने अन्तस की और बाह्य बुराइयों को मिटा कर हम विजय पर्व मनाते हैं। नवरात्रि के दौरान उपवास रखने की परंपरा स्वास्थ्य वर्धन और आत्म-शुद्धि का संकेत है। यह लोगों को संयमित जीवन जीने और अपनी सेहत का ध्यान रखने के लिए भी प्रेरित करता है। नवरात्रि भक्ति और आस्था का प्रतीक पर्व है।
ऐसा माना जाता है कि सर्व प्रथम श्री राम ने लंका युद्ध में रावण का वध करने से पहले माता का आशीर्वाद पाने के लिए देवी मां की पूजा अर्चना किया था। जिसमें भगवान श्री राम ने एक सौ आठ नील कमल अर्पित किया था। तब देवी ने प्रसन्न होकर स्वयं को प्रकट किया और श्री राम को विजय श्री का आशीर्वाद दिया था। दशमी के दिन भगवान श्री राम के हाथों रावण का वध हुआ। इसीलिए इसे विजय पर्व या विजया दशमी भी कहते हैं। इस पर्व से जुड़ी एक अन्य कथा के अनुसार आठवें मनु और सूर्य के पुत्र राजा सुरथ का राज्य शत्रुओं ने नष्ट कर दिया था। तब वे समाधि नाम के वैश्य के साथ मार्कण्डेय ऋषि के आश्रम में गए, उन्हें अपनी आपबीती सुनाई। तब ऋषि मारकण्डेय ने उन्हें नवदुर्गा की उत्पत्ति, आराधना व शक्ति सिद्धि का मार्ग बताया। जिसका उल्लेख श्री दुर्गा सप्तशती में मिलता है।
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी
तृतीयं चन्द्र-घण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्
पञ्चमं स्कन्द मातेति षष्ठं कात्यायनीति च
सप्तमं कालरात्रीति महा गौरीति चाष्टमम्
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।
नव दुर्गा के अलग अलग नाम व रूप हैं। प्रथम शैलपुत्री, द्वितीय ब्रह्मचारिणी, तृतीय चंद्रघंटा, चतुर्थ कुष्मांडा, पंचम स्कन्धमाता, षष्ठम कात्यायनी, सप्तम कालरात्रि, अष्टम महागौरी व नवम सिद्धिदात्री हैं। नव दुर्गा के प्रत्येक स्वरुप की स्तुति के लिए नौ मंत्र हैं।
1.प्रथम स्वरुप मां शैलपुत्री
पहला दिन मां शैलपुत्री को समर्पित होता है। वृषभ पर विराजमान मां शैलीपुत्री के एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में कमल है। उनका यह स्वरूप बेहद शुभ माना जाता है। मां शैलपुत्री हिमालय की पुत्री हैं। इसलिए माता को शैलपुत्री या पर्वतों की देवी कहा जाता है। माता शांति और उत्साह देने वाली और भय को दूर करने वाली होती है।
नवरात्रि के पहले दिन माता शैलपुत्री का स्तुति मंत्र –
या देवी सर्वभूतेषु प्रकृति रूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
वंदे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारूढ़ा शूलधारां शैलपुत्री यशस्विनीम् ।।
अर्थात देवी प्रकृति रूप में सभी जीवों में निवास करती हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है। हम वृषभ पर विराजमान, चंद्रकला को शिखर पर धारण करने वाली, त्रिशूल धारण करने वाली, और यशस्वी माँ शैलपुत्री की वंदना करते हैं, जो हमारी मनोकामनाएं पूरी करती हैं।
2.द्वितीय स्वरुप मां ब्रहाचारिणी
दूसरा दिन मां ब्रह्मचारिणी को समर्पित होता है। इन्हें भ्रमरादेवी भी कहा है। मां ब्रह्मचारिणी के दाहिने हाथ में जप की माला व बाएं हाथ में कमंडल है। माता का आभामंडल ज्योतिर्मय है जो दुष्टों को भी सही मार्ग दिखाती हैं। मां ने महादेव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप किया था। ये तप और साधना की देवी है। इनका स्वरूप साधक और तपस्वियों के लिए प्रेरणा स्रोत है।
नवरात्रि के दूसरे दिन माता ब्रह्मचारिणी का स्तुति मंत्र –
या देवी सर्वभूतेषु प्रकृति रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
करपाद्माभ्याम अक्षमालकमण्डलु देवि।
प्रसीदतु मयि ब्रम्हचारिण्यनुत्तमा।
अर्थात जो देवी सभी प्राणियों में प्रकृति रूप में स्थित हैं, उन्हें बारंबार नमस्कार है। हाथ-पद्मों में अक्षमाला और कमंडल धारण किए हुए माँ ब्रह्मचारिणी हम आपसे प्रसन्न होने का निवेदन करते हैं।
3.तृतीय स्वरूप मां चंद्रांटा
तीसरा दिन मां चंद्रघंटा को समर्पित होता है। माता को स्वर की देवी भी कहते हैं। माता अपने मस्तक पर घंटे के आकार का चंद्रमा धारण किये हैं। माँ चंद्रघंटा का नाम उनके घण्टे के आकार के चंद्रमा के साथ जुड़ा है। माता की पूजा करने से भक्तों में वीरता, निर्भयता और सौम्यता का विकास होता है। मां की मुद्रा युद्ध मुद्रा है। ये युद्ध की देवी हैं और भक्तों को भय से मुक्ति देती हैं।
नवरात्रि के तीसरे दिन माता ब्रह्मचारिणी का स्तुति मंत्र-
पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपाखकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यां चन्द्रघण्टेति विश्रुता ।।
अर्थात मां का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। इनके मस्तक में घंटे के आकार का अर्धचंद्र है। इसी कारण माता चंद्रघंटा देवी कहलाती हैं।
4.चतुर्थ स्वरूप मां कूष्मांडा
चौथा दिन माँ कूष्मांडा को समर्पित है। माँ कूष्मांडा को सृष्टि की उत्पत्ति करने वाली देवी माना जाता है। माता को “आदिशक्ति और आदिस्वरुपा” भी कहते हैं। माता ने अपनी दिव्य मुस्कान से संसार का अँधेरा दूर किया था। सभी के दुःखों को हरने वाली माता का निवास स्थान सूर्य है। माता सिंह पर सवार है जो धर्म का प्रतीक माना जाता है।
नवरात्रि के चौथे दिन माता ब्रह्मचारिणी का स्तुति मंत्र-
सुरासम्पूर्णकलशं पूर्ण कलश रुधिराप्लुतमेव चः।
दधाना हस्तपद्माभ्यांः कूष्माण्डा शुभदास्तु मेः।।
अर्थात मैं माँ कूष्माण्डा को नमन करता हूँ, जो अपनी कमल समान हथेलियों में सोमरस से पूर्ण कलश और रक्त से भरा हुआ कलश धारण करती हैं। वे मुझे शुभता प्रदान करें।
5.पंचम स्वरुप मां स्कन्दमाता
पांचवां दिन माता स्कन्दमाता को समर्पित है। स्कंद माता अपने पुत्र कार्तिकेय के साथ पूजी जाती है। ये भक्ति और मातृत्व का प्रतीक हैं। माँ स्कंदमाता की बड़ी महिमा है, जो सिंह पर विराजमान, कमल का फूल लिए हुए और अपने पुत्र स्कंद (कार्तिकेय) को गोद में लिए हुए हैं। वे सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं और भक्तों को शांति, संतान सुख और अलौकिक तेज प्रदान करती हैं।
नवरात्रि के पांचवें दिन माता ब्रह्मचारिणी का स्तुति मंत्र-
या देवी सर्वभूतेषु माँ स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
‘सिंहासनगता नित्यं पद्माञ्चितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥
अर्थात हे देवी, जो सभी प्राणियों में स्कंदमाता के रूप में विराजमान हैं, उन्हें मेरा बारंबार नमस्कार है। जो नित्य सिंह के आसन पर विराजमान हैं, जिनके दोनों हाथों में कमल के पुष्प हैं, वह यशस्विनी देवी स्कंदमाता सदा शुभ प्रदान करने वाली हैं।
6.षष्ठम स्वरुप मां कात्यायनी
छठा स्वरूप मां कात्यायनी को समर्पित है जो बृहस्पति ग्रह का संचालन करती है। मां की पूजा करने से मस्तिष्क, त्वचा, अस्थि और संक्रमण के रोगों में लाभ मिलता है।
माँ कात्यायनी युद्ध और शक्ति की देवी है। इनका स्वरूप दुर्गा रूप में देखा जाता है, जो राक्षसों का संहार करती है।
माँ कात्यायनी का पूजन करने से व्यक्ति सफलता और प्रसिद्धि प्राप्त करता है।
नवरात्रि के छठे दिन माता ब्रह्मचारिणी का स्तुति मंत्र-
चंद्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवर वाहनाः।
कात्ययनी शुभं दद्याद् देवी दानव घातिनीः।।
या देवी सर्वभूतेषु प्रकृतिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्ये नमो नमः।।
अर्थात चंद्रहास यानी तलवार की तरह चमकते हाथों वाली, सिंह पर सवार, दानवों का नाश करने वाली देवी कात्यायनी सभी को शुभप्रदान करें। जो देवी सभी जीवों में प्रकृति के रूप में स्थित हैं, उन्हें बारंबार नमस्कार है। यह मंत्र मां दुर्गा के सर्वव्यापक स्वरूप को समर्पित है।
7.सप्तम स्वरुप मां कालरात्री
सातवां स्वरूप मां कालरात्री को समर्पित है। इनको
शुभंकरी के नाम से भी जाना जाता है। देवी कालरात्रि का स्वरुप अत्यंत भयंकर है, जो मधु कैटभ जैसे असुर और पापियों का नाश एवं दुष्टों का संहार के लिए है। तांत्रिक विद्या करने वालो के लिए यह दिन शुभ माना जाता है।
नवरात्रि के सातवें दिन माता ब्रह्मचारिणी का स्तुति मंत्र-
एकवेणी जपाकर्णपूरा बन्ना खरास्थिता,
लम्बोष्टी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी। वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा,
वर्धनमूर्थध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥
अर्थात मां कालरात्रि का वर्ण रात्रि के समान काला है, परन्तु वे अंधकार का नाश करने वाली हैं। दुष्ट राक्षसों का अंत करने वाला मां दुर्गा का यह रूप देखने में अत्यंत भयंकर है लेकिन शुभ फल देता है। इसलिए भी शुभंकरी भी कहलाई। मां कालरात्रि के ब्रह्माण्ड के समान गोल नेत्र हैं। अपनी हर श्वास के साथ मां की नासिका से अग्नि की ज्वालाएं निकलती रहती हैं। अपने चार हाथों में खड्ग, लोहे का अस्त्र धारण किए हुए, अभयमुद्रा और वरमुद्रा किये हुए मां अपने वाहन गर्दभ पर सवार हैं।
8.अष्टम स्वरुप मां महागौरी
आठवां स्वरूप मां महागौरी को समर्पित है। आदिशक्ति मां दुर्गा का अष्टम स्वरूप श्री महागौरी है, माता गौरवर्णी हैं। शुभ निशुंभ से युद्ध में पराजित होने पर देवताओं ने गंगा नदी के तट पर माता से सुरक्षा की प्रार्थना की थी।
यह एक संस्कृत श्लोक है जो देवी महागौरी की स्तुति करता है, जिसमें कहा गया है कि वे सफेद बैल पर सवार होती हैं, श्वेत वस्त्र पहनती हैं, और भक्तों को शुभता (कल्याण) और प्रसन्नता प्रदान करती हैं। यह श्लोक दुर्गा अष्टमी के दिन माँ महागौरी की आराधना के दौरान बोला जाता है, और यह भक्तों की मनोकामनाओं को पूरा करने और क्लेशों को दूर करने के लिए उनकी कृपा प्राप्त करने की प्रार्थना करता है।
नवरात्रि के आठवें दिन माता ब्रह्मचारिणी का स्तुति मंत्र –
श्वेत वृषे समारूढ़ाः श्वेतांबरधरा शुचिः।
महागौरी शुभम् दद्यान्महादेवप्रमोददा।।
अर्थात जो सफेद बैल पर सवार हैं, जो शुद्ध सफेद वस्त्र धारण करती हैं। हे महागौरी, जो महादेव भगवान शिव को भी आनंदित करती हैं, वे मुझे शुभता (कल्याण) प्रदान करें।
9.नवम स्वरुप मां सिद्धिदात्री
नवां स्वरुप मां सिद्धिदात्री को समर्पित है। ये अपने भक्तों को अनेक सिद्धियाँ, यश, बल और धन प्रदान करती हैं। रोग,भय एवं शोक से मुक्ति देती हैं। माता ज्ञान और समृद्धि की देवी है, जो अपने भक्तों को सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त करने का आशीर्वाद देती हैं।
नवरात्रि के नौवें दिन माता ब्रह्मचारिणी का स्तुति मंत्र –
नमस्तेऽस्तु महामाया श्रीपीठे सुरपूजिते।
शंखचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मी नमोऽस्तुते।।
अर्थात हे महालक्ष्मी आपसे प्रार्थना है कि जो सृष्टि की मूल शक्ति हैं, महामाया हैं, अपने निवास स्थान श्रीपीठ पर विराजमान हैं और देवताओं द्वारा पूजित हैं, उन्हें नमस्कार है। अपने हाथों में शंख, चक्र और गदा धारण करने वाली देवी महालक्ष्मी आपको नमस्कार है।
शास्त्रों में यह भी वर्णित है कि एक स्त्री के पूरे जीवनचक्र का प्रतीक है नवदुर्गा के नौ रुप। जन्म ग्रहण करती हुई कन्या “शैलपुत्री” स्वरूपा हैं। कौमार्य अवस्था तक “ब्रह्मचारणी” का रूप हैं। विवाह से पूर्व चंद्रमा के समान निर्मल होने से वह “चंद्रघंटा” समान हैं। नए जीव को जन्म देने के लिए गर्भ धारण करने पर वह “कूष्मांडा” स्वरूप में हैं। संतान को जन्म देने के बाद वही स्त्री रुप “स्कन्दमाता” हो जाती हैं। संयम एवं साधना को ग्रहण करने वाली वही स्त्री स्वरुप “कात्यायनी” कहलाती हैं। अपने संकल्प से पति की अकाल मृत्यु को भी जीत लेने से वह “कालरात्रि” कही जाती हैं। संसार का उद्धार और उपकार करने से माता “महागौरी” हो जाती हैं। धरती को छोड़कर स्वर्ग प्रयाण करने से पहले संसार में अपनी संतान को सिद्धि यानी समस्त सुख-सम्पदा का आशीर्वाद देने वाली मां “सिद्धिदात्री” हो जाती हैं।
इसलिए नवरात्रि समाज में महिलाओं की स्थिति को सशक्त करने का भी संकेत देती है। नवरात्रि का पर्व नए मौसम और नई फसल के आगमन का प्रतीक पर्व है। शारदीय नवरात्रि विशेष रूप से शरद ऋतु में मनाई जाती है, जो समृद्धि और खुशियों का संदेश लाती है। नौ रात्रियों के बाद दसवें दिन विजयादशमी का त्योहार भी मनाया जाता है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का द्योतक है।
सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्येत्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुऽते॥











