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बल्ले से नहीं चला जादू, लेकिन कप्तानी में दिखा दम; अब टीम का अगला लक्ष्य…

नई दिल्ली। जैसे ही Tilak Varma ने Jacob Duffy का कैच लपका, वैसे ही टी20 विश्व कप फाइनल में भारत की जीत पक्की हो गई। इस ऐतिहासिक पल के साथ ही कप्तान Suryakumar Yadav के चेहरे पर एक हल्की लेकिन खास मुस्कान दिखाई दी। यह मुस्कान सिर्फ जीत की नहीं, बल्कि उन तमाम आलोचनाओं का जवाब भी थी जो पूरे टूर्नामेंट के दौरान उनके खराब बल्लेबाजी प्रदर्शन को लेकर उठती रही थीं।

दरअसल, टूर्नामेंट से पहले न्यूजीलैंड के खिलाफ द्विपक्षीय सीरीज में मिली हार और पिछले कुछ समय से बड़ी पारी नहीं खेलने के कारण सूर्यकुमार यादव पर भारी दबाव था। टी20 विश्व कप में भी उनका बल्ला ज्यादा नहीं चला। नौ मैचों में वह सिर्फ एक अर्धशतक ही लगा पाए। अमेरिका के खिलाफ पहले मुकाबले में उन्होंने नाबाद 84 रन की शानदार पारी खेली, लेकिन इसके बाद उनका प्रदर्शन खास नहीं रहा।

फाइनल मुकाबले में तो सूर्या पहली ही गेंद पर बिना खाता खोले पवेलियन लौट गए। ऐसे में कई फैंस ने सोशल मीडिया पर यह तक कह दिया कि अगर वह कप्तान नहीं होते तो शायद प्लेइंग इलेवन में भी जगह नहीं मिलती।

हालांकि बल्लेबाजी में संघर्ष के बावजूद कप्तान के तौर पर सूर्यकुमार यादव ने टीम को बेहतरीन तरीके से संभाला और अंततः भारत को विश्व चैंपियन बना दिया। जीत के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने साफ कहा कि टीम का अगला बड़ा लक्ष्य 2028 में 2028 Summer Olympics में क्रिकेट का गोल्ड मेडल जीतना होगा, जो Los Angeles में आयोजित होगा।

टीम इंडिया के कोच Gautam Gambhir के साथ सूर्यकुमार यादव की जुगलबंदी भी मजबूत मानी जा रही है और फिलहाल उनकी कप्तानी को लेकर कोई खतरा नहीं दिख रहा।

भारत में खेले गए विश्व कप में इससे पहले सिर्फ Mahendra Singh Dhoni ने 2011 में टीम को वनडे विश्व कप जिताया था। वहीं Kapil Dev (1987) और Rohit Sharma (2023) अपनी सरजमीं पर यह उपलब्धि हासिल नहीं कर सके थे।

मुंबई के ही रोहित शर्मा से सूर्यकुमार की तुलना स्वाभाविक थी, लेकिन सूर्या ने पूरे टूर्नामेंट में एक ही मंत्र अपनाया—दबाव से दूर रहना। प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी उनका अंदाज बेहद सहज रहा। चाहे सवाल Abhishek Sharma को लेकर हो या Kuldeep Yadav के प्रदर्शन पर, उन्होंने हमेशा मुस्कुराते हुए चुटीले अंदाज में जवाब दिए।

सूर्यकुमार यादव ने टीम के भीतर भी कभी ‘सूर्या दादा’ बनने की कोशिश नहीं की। उन्होंने खिलाड़ियों को खुलकर खेलने और अपना रास्ता खुद तय करने की आजादी दी। फाइनल से पहले उन्होंने कहा था कि कप्तान बनने के कुछ ही महीनों में उन्हें टीम की सोच समझ आ गई थी और तब उन्हें महसूस हुआ कि खिलाड़ियों को मार्गदर्शन देने के साथ-साथ उन्हें स्वतंत्रता देना भी उतना ही जरूरी है।

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