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सहज प्रेम: रकमिश सुलतानपुरी

सहज प्रेम से दूर आदमी लिए स्वयं की बात अड़ा है दुनिया की इसचकाचौंध मेंहमने देखे खूब मुखौटेराह भटकतेमिले...

शूल सी दुर्भावनाएँ- शशि पुरवार

कागजों पर ही सिमटकर शेष हैं संभावनाएँ क्या करें शिकवा जहाँ से मर गयीं संवेदनाएँ घात करते, लोग सारे खून में डूबे हुए हैं व्यर्थ  के संवाद करते आज मनसूबे हुए हैं रक्तरंजित हो...

ज़िन्दगी आँसू बहाती- रकमिश सुल्तानपुरी

आधुनिकता वक्त पाकर देख दर्पण मुस्कुराती वक़्त गिरवी सा पड़ा है ज़िन्दगी आँसू बहाती जंगलों का काफ़िला अब ख़ौफ़ से सहमा हुआ है ले प्रगति की नव कुल्हाड़ी वो शहर दौड़ा हुआ है स्वार्थ का स्तर बढ़ा...

जिंदगी में- रकमिश सुल्तानपुरी

थक गयी हैं आज सड़कें आदमी का भार ढोकर जिंदगी में आ गया है दर्द का संयोग कैसा दूर रखता आदमी को आदमी से, रोग कैसा? सुप्त नगरों में जगी हैं चुप्पियों की नस्ल सारी ख़ौफ़...

दर्द सारी रात जागा- रकमिश सुल्तानपुरी

सो गई भूखी थकाने दर्द सारी रात जागा खेत खलिहानों से लौटी कँपकपाती बदनसीबी छप्परों में जा सिसकती ओढ़ रजनी को गरीबी भूख ले आयी कटोरे में भरे पर्याप्त आंसू मौन चुप्पी तोड़ता है ले नया करवट अभागा छोड़...

फूल सरसों के झरे क्यों- रकमिश सुल्तानपुरी

बादलों ने नभ, निलय में इन्द्रधनुषी रँग भरे क्यों? सह थपेड़े मौसमों के, फूल सरसों के झरे क्यों? आह में तप सतपथों पर तीव्रगति से तू चला चल दुखभरी इक रात भी तो मनुज...

देखकर नवजात कल्चर- रकमिश सुल्तानपुरी

हूँ नहीं कवि व्यर्थ अपनी लेखनी किस पर चलाऊं सोचता हूँ शांति की छाया कहीं से ढूढ़ लाऊं भाव में नित लिप्त होकर ठूँठ सी दमदार लघुता संग पाकर स्वार्थों का हो गयी ढोंगी मनुजता आश्वासन छल...

नवगीत- रकमिश सुल्तानपुरी

सहज प्रेम से दूर आदमी लिए स्वयं की बात अड़ा है दुनिया की इस चकाचौंध में हमने देखे खूब मुखौटे राह भटकते मिले नयनसुख अंधे रखते है कजरौटे बैसाखी पर शेष सभ्यता डगमग चलती मार...

हवाओं से पैगाम लिखवाती- अनिता सैनी

ह्रदय में करुण रागिनी सांसे विचलित कर जाती मिटे माटी के लाल क्यों सुकून की नींद आ जाती? हाहाकार गूंज रहा कण-कण में स्मृति दौड़ आ जाती वेदना असीम ह्रदय...

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