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बालक ढूंढ रहा कचरे में रोटी: अंजना वर्मा

तुम कहते हो कि दुनिया, हो गयी है इतनी छोटी,क्यों बालक ढूँढ रहा है कचरे में अपनी रोटी?

पुष्प: जॉनी अहमद

मैं रूप का वो कोष हूँ जो रिक्त नहीं होताशब्दों से मेरा सौंदर्य व्यक्त नहीं होता वसुंधरा...

तुम्हारी क़ातिल निगाहें: प्रार्थना राय

ये सच है तुमसे मेरी निस्बत रहीखराबी तुम्हारे इश्क़ में नहीं, तुम में रवादारी नहीं रही कोसते हो...

ख़ामोशी और प्रेम: जसवीर त्यागी

तुम पुरुष होशब्दों की सीढ़ियों से पाना चाहते होप्रेम का शीर्ष जिस रोज़ स्त्री बनकरख़ामोशी से प्रेम...

प्रकृति की क्रोधाग्नि: दिनेश प्रजापत

मृत्यु के कगार पर बैठे हैं वेफिर भी तृष्णा के तीर लगाए बैठे हैं वेअनैतिकता की झोली भर कर वेचल रहे...

2020 क्या-क्या नहीं सिखाया: हर्षिता डावर

2020 ने क्या-क्या नहीं दिखाया2020 क्या-क्या नहीं सिखायाअपने से अपनों का एहसास करवायाकितना खोया है कितना पाया कितना बदला है कितना बदलवाया...

यह साल कैसा रहा: प्रियंका पांडेय त्रिपाठी

यह साल कैसा रहा।करते है इस पर चर्चा।। चीन ने बिना हथियार के आतंक मचाया।पूरे विश्व मे...

राष्ट्र बचाए रखना: गरिमा गौतम

हे गिरधारी मेरे राष्ट्र को बचाए रखना इस पर सदा अपनी कृपा बनाये रखना कल कल सरिता बहती जाए जन जन की प्यास बुझाती जाए सदानीरा इनको बनाए...

भगवान कहाँ है: हितेश सहगल

कभी कभी तो पूछता हूँ खुद से कि भगवान कहां है? क्या वो मंदिरों, मस्जिदों, मीनारों में है? या ज़मीन आसमान या दीवारों में है? क्या वो शहरों...

पूरी हो अरदास: सुरेंद्र सैनी

रह-रह के चुभ रही, मेरे सीने में एक फ़ांस कैसे सुलझेगी उलझन, क्या है इनका सारांश सारी युक्ति लगा देखी, नहीं मिला लाभांश जैसे रास्ता भटक गया, मेरा दूर बहुत आवास बिगड़ी...

पाँव के छाले: ईशिका गोयल

तपती दोपहर नंगे पांव जा रहे हैं अपने गाँव वो तुम्हारे साथ राष्ट्र के निर्माण में आगे रहे तुम महलो में सोए वो जागे रहे जब तक रुक...

दोस्ती- दीपा सिंह

दोस्ती जिंदगी जीने का दूसरा नाम है क्या पता कल क्या हो ऐ मेरे दोस्त तू सलामत रहना मुझे भूल मत जाना जो वक्त हमने साथ में गुजारें...

वंदन कोरोना योद्धा- डॉ शेख

ऐ भारत के वीरों, ऐ धरती माँ के दिलेरों, तुम ही हो असली हीरो, तुम्हे सलाम तुम्हे सलाम तुम्हे सलाम तुम निडर बड़े निराले हो, हर जान के रखवाले...

यादें: मनोज कुमार

तेरे शहर से मेरे घर तक, कोई आता जाता रहता है, तेरी गलियों से निकल कर, रोज मेरी खिड़की तक आता है, हवा के झोंके के साथ रोज, बालकनी...

मौन के समक्ष: रक्षित राज

जब भी भाषा मौन के समक्ष बेबस हो तो हमें अपने मौन को चुम्बन में उड़ेल देना चाहिए प्रेम का आरंभ सूर्योदय है एवं अंत सूर्यास्त है अतः प्रेम की दुपहरी...

बाढ़: पंकज कुमार

आते है बाढ़ बहुत सोच-समझकर, संग ले कुछ मौन लफ्जो का बहार छोड़ जाते है कुछ उर्वर मिट्टियों का उपहार, लोगो का उजाड़ घर-संसार तोड़ देते है वे...

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