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उलझे बालों सी ज़िन्दगी- सुरजीत तरुणा

उलझे बालों सी ज़िन्दगी और.... सुलझाने में चुभते है रोज़ रिश्तों के कंघें फ़िर उसपे यह दर्द की सँवारना है उन्हें... तो कसकर गूँथना है उन्हें और.... ना खुलें कोई जोड़ रिश्तों की चोटी का तो बाँधनी है एक फ़ीते से गाँठ भी जो...

आसमां के बंद कमरे- सुरजीत तरुणा

आज फिर दिल के अँधियारे भरे आसमां के बंद कमरे की तरफ देखा दरवाज़े पे यादों की परतें कराह रही थी काँपते हाथों से अरमानों के चिथड़े लिये उनकी तहें साफ़...

प्रेम के आख़र-सुरजीत तरुणा

प्रेम ने कहा, क्या मैं अपनी उँगलियों से तुम्हारा नाज़ुक चेहरा छू सकता हूँ? मैंने अपनी आँखें बंद कर ली उसने धीरे-धीरे मेरे चेहरे को छुआ मैं पिघलकर चाँदनी...

ग़म के लबों पे आज- सुरजीत तरुणा

स्याह रातों के ख़वाबों ने छुआ था कभी संगलाख उँगलियों से जिन्हें ग़म के लबों पे आज फ़िर से शबनम के क़तरें हैं चिलमनों से झाँकते थे कभी वो हसरतों...

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