भोपाल,(हि.स.)। मध्यप्रदेश विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दूसरे दिन मंगलवार को जबलपुर उत्तर मध्य विधानसभा क्षेत्र के विधायक डॉ. अभिलाष पाण्डेय ने 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों में तेजी से बढ़ते स्मार्टफोन और इंटरनेट के अनियंत्रित उपयोग को एक गंभीर सामाजिक संकट बताते हुए सरकार का ध्यान इस ओर आकर्षित किया।
उन्होंने कहा कि मोबाइल और इंटरनेट की निरंतर उपलब्धता ने छोटे बच्चों के जीवन में गहरे बदलाव ला दिए हैं। पढ़ाई, खेलकूद, पारिवारिक संवाद और रचनात्मक गतिविधियों से उनका जुड़ाव कम हो रहा है, जिसके परिणामस्वरूप मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
डॉ. पाण्डेय ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हाल ही में ‘मन की बात’ कार्यक्रम में परिवारों को ‘नो गैजेट जोन’ बनाने की अपील ने उन्हें यह विषय सदन में उठाने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि संघ के पंच परिवर्तन कार्यक्रम के अंतर्गत कुटुंब प्रबोधन में भी इस विषय पर व्यापक स्तर पर कार्य किया जा रहा है, क्योंकि डिजिटल युग में बच्चों की जीवनशैली और व्यवहार पर मोबाइल फोन का प्रभाव चिंताजनक रूप से बढ़ रहा है।
सदन में प्रस्तुत अपने ध्यानाकर्षण प्रस्ताव में उन्होंने कहा कि 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में डिजिटल लत अत्यंत तेजी से बढ़ रही है। बच्चे घंटों मोबाइल स्क्रीन से चिपके रहते हैं, जिससे उनकी एकाग्रता, स्मरण शक्ति और दृष्टि पर नकारात्मक असर पड़ रहा है। साथ ही नींद संबंधी समस्याएँ और स्क्रीन एडिक्शन के लक्षण भी बढ़ रहे हैं।
मनोवैज्ञानिकों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों में चिड़चिड़ापन, अवसाद, अकेलापन, व्यवहारिक असामान्यता और सीखने की क्षमता में गिरावट का कारण बन रहा है। इंटरनेट की अनियंत्रित उपलब्धता के चलते बच्चे अनुचित गेम, वीडियो, वेबसाइट और वयस्क सामग्री तक आसानी से पहुँच रहे हैं, जिससे उनके मूल्यबोध और चरित्र निर्माण पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है।
डॉ. पाण्डेय ने कहा कि स्वास्थ्य, शिक्षा और महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा इस विषय पर अब तक पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए हैं। अभिभावक जागरूकता, स्कूल आधारित नियंत्रण, डिजिटल सुरक्षा शिक्षा और मनोसामाजिक सहायता जैसे क्षेत्रों में और गंभीर प्रयासों की आवश्यकता है।
उन्होंने सरकार से माँग की कि विद्यालयों, आंगनबाड़ियों और समुदाय स्तर पर बड़े पैमाने पर जागरूकता अभियान चलाए जाएँ। अभिभावकों के लिए विशेष परामर्श कार्यक्रम तैयार किए जाएँ और बच्चों के लिए सुरक्षित इंटरनेट उपयोग और डिजिटल साक्षरता को अनिवार्य शिक्षा के रूप में शामिल किया जाए।
उन्होंने यह भी कहा कि स्कूलों में स्मार्टफोन उपयोग के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएँ और आयु-उपयुक्त सामग्री नियंत्रण की मजबूत व्यवस्था विकसित की जाए। साथ ही बच्चों के लिए मनोवैज्ञानिक परामर्श सेवाओं का विस्तार सुनिश्चित किया जाए।
उन्होंने खेल, कला और सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर भी जोर दिया, ताकि बच्चे स्क्रीन से दूर रहकर वास्तविक दुनिया में सक्रिय रूप से जुड़ सकें। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि स्थिति पर तुरंत नियंत्रण नहीं किया गया तो भविष्य की पीढ़ी गंभीर समस्याओं का सामना कर सकती है।
ध्यानाकर्षण का जवाब देते हुए महिला एवं बाल विकास मंत्री निर्मला भूरिया ने कहा कि राज्य सरकार बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर अत्यंत गंभीर है और इस दिशा में निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं।
उन्होंने बताया कि किशोर न्याय अधिनियम, पोक्सो एक्ट, आईटी एक्ट और राज्य की बाल संरक्षण नीति के अंतर्गत अभिभावकों, स्कूलों, बाल कल्याण समितियों तथा जिला बाल संरक्षण इकाइयों को बच्चों के डिजिटल उपयोग पर निगरानी रखने की जिम्मेदारी दी गई है।
मंत्री ने कहा कि बच्चों और अभिभावकों को सुरक्षित इंटरनेट उपयोग के लिए लगातार जागरूक किया जा रहा है। ऑनलाइन उत्पीड़न, अश्लील सामग्री और साइबर अपराधों से बचाव को लेकर कानूनी प्रावधानों का प्रभावी क्रियान्वयन किया जा रहा है। आंगनबाड़ी केंद्रों, स्कूलों और समुदाय स्तर पर साइबर सुरक्षा कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं। साथ ही इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया सहित आकाशवाणी, दूरदर्शन और सोशल मीडिया के माध्यम से व्यापक प्रचार-प्रसार किया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि भारत सरकार के सावित्रीबाई फुले राष्ट्रीय महिला बाल विकास संस्थान, उच्च न्यायालय जबलपुर, गृह मंत्रालय और विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा समय-समय पर संबंधित स्टेकहोल्डर्स को प्रशिक्षण दिया जाता है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन और स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा कक्षा 6 से 10 के विद्यार्थियों के लिए ‘उमंग’ मॉड्यूल विकसित किया गया है, जिसमें डिजिटल और सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग के दुष्प्रभावों की विस्तृत जानकारी शामिल है।
मंत्री भूरिया ने सदन को आश्वस्त किया कि बच्चों के स्क्रीन टाइम नियंत्रण और ऑनलाइन सुरक्षा को और मजबूत बनाने के लिए राज्य सरकार विभिन्न विभागों के साथ समन्वय कर ठोस कदम उठा रही है, जिससे बच्चों का भविष्य सुरक्षित और स्वस्थ दिशा में आगे बढ़ सके।












