जितनी बार टूटूँगा: संजय अश्क़

जितनी बार टूटूँगा निखर जाऊंगा
मैं शीशा नहीं जो बिखर जाऊंगा

मुश्किलों ने मुझे जीना सिखाया है
हालातों ने जख्म सीना सिखाया है
जितना डुबाओगे उतना उभर जाऊंगा,

तकलीफों ने हँसने का हुनर दिया है
हादसों ने सफर और बेहतर किया है
जरा भी न सोचना की मैं ड़र जाऊंगा

कांटों पे चल के आगे बढ़ना आता है
दीया होकर तूफां से लड़ना आता है
मैं अंधेरों को रोशनी से भर जाऊंगा,

संजय अश्क़
बालाघाट, मध्य प्रदेश