
शिक्षक, जोधपुर
“असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय।”
अर्थात्- हे प्रभु! हमें असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर, और मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो।
यह श्लोक केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि जीवन की दिशा है। दीपावली का पर्व भी इसी भाव को जगाने वाला उत्सव है- अंधकार से प्रकाश की यात्रा का, अज्ञान से ज्ञान की ओर बढ़ने का और असंवेदनशीलता से संवेदनशीलता की ओर उन्नति का। भारतीय संस्कृति में दीपावली केवल दीप प्रज्ज्वलन का पर्व नहीं है, यह आत्मजागरण, सामाजिक नवनीति और राष्ट्र पुनर्निर्माण का सन्देश देने वाला महापर्व है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सदैव भारतीय समाज को केवल उत्सवों के माध्यम से आनन्द देने का कार्य नहीं किया, बल्कि उन्हें समाज परिवर्तन और राष्ट्रनिर्माण की दिशा में जागरूक करने का भी प्रयास किया है। संघ द्वारा प्रतिपादित “पंच परिवर्तन” का भाव, इसी दृष्टिकोण को मूर्त रूप देता है। दीपावली जैसे पर्व के अवसर पर इन पंच परिवर्तनों को जीवन में उतारना, दीपोत्सव को केवल बाह्य नहीं, बल्कि भीतरी आलोक का पर्व बना देता है। ये पंच परिवर्तन हैं- सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी आचरण और नागरिक कर्तव्य।
सामाजिक समरसता: दीप जो सबके लिए समान रूप से जले
भारतीय संस्कृति का मूल तत्व “वसुधैव कुटुम्बकम्” का भाव है। आज भी जब हम दीप जलाते हैं, तो वह केवल अपने द्वार पर प्रकाश नहीं करता, बल्कि पूरे वातावरण को आलोकित कर देता है। यही समरसता का संदेश है। संघ का मत है कि समाज तभी सशक्त होगा जब उसमें ऊँच-नीच, भेदभाव और अलगाव की भावना समाप्त होगी। दीपावली का पर्व हमें यह प्रेरणा देता है कि हम अपने आस-पास के हर व्यक्ति को अपने समान समझें, समाज के प्रत्येक वर्ग, जाति और समुदाय के साथ मिलकर उत्सव मनाएं।
संघ अपने स्वयंसेवकों को यह सिखाता है कि समरसता केवल भाषण या नारों का विषय नहीं है, यह व्यवहार में उतरनी चाहिए। दीपावली के अवसर पर यदि हम किसी गरीब परिवार के साथ मिठाई बाँटें, उनके घर में दीप जलाएं या उन्हें सम्मान का भाव दें, तो वही सच्ची समरसता होगी। जब समाज के प्रत्येक वर्ग के घर में दीप समान रूप से प्रज्वलित होंगे, तभी भारत वास्तव में जगमगाएगा।
कुटुंब प्रबोधन: परिवार ही संस्कारों का प्रथम विद्यालय
भारतीय जीवन की शक्ति उसका परिवार है। आज जब आधुनिकता की चकाचौंध में परिवार टूट रहे हैं, संवाद की जगह स्क्रीन ने ले ली है, तब कुटुंब प्रबोधन का महत्व और भी बढ़ गया है। संघ का यह परिवर्तन हमें याद दिलाता है कि दीपावली का पर्व परिवारिक संवाद, प्रेम, एकता और संस्कारों को पुनः जागृत करने का अवसर है।
जब परिवार के सभी सदस्य मिलकर घर की सफाई करते हैं, पूजन की तैयारी में भाग लेते हैं, छोटे-बड़े मिलकर दीप सजाते हैं, तो केवल घर नहीं, हृदय भी पवित्र होते हैं। परिवार में संवाद, आदर और स्नेह का दीप जलाना ही कुटुंब प्रबोधन का सच्चा रूप है। इस दीपावली पर यदि हम एक दिन मोबाइल और टीवी से दूर रहकर अपने परिवार के साथ बैठें, बातें करें, अतीत की यादें ताजा करें और भविष्य के संकल्प बनाएं, तो यह पर्व अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त कर लेगा।
पर्यावरण संरक्षण: हरित दीपावली, स्वच्छ वातावरण
आज जब दुनिया पर्यावरण संकट से जूझ रही है, तब भारत का यह पर्व हमें बताता है कि सच्चा उत्सव वही है जो प्रकृति के साथ संगति में मनाया जाए। संघ द्वारा सुझाया गया पर्यावरण संरक्षण का परिवर्तन इस बात की ओर ध्यान दिलाता है कि हम प्रदूषण से रहित, प्रकृति-सम्मत और शांति पूर्ण दीपावली मनाएं।
पटाखों का शोर और धुआँ हमारे वातावरण, पशु-पक्षियों और बच्चों के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डालता है। अतः इस दीपावली पर मिट्टी के दीपक जलाना, वृक्षारोपण करना, गोबर और गोमूत्र से बने उत्पादों का उपयोग करना, और स्थानीय कारीगरों के पर्यावरण-हितैषी उत्पादों को अपनाना ही सच्चा पर्यावरण संरक्षण है। संघ के कार्यकर्ता गाँव-गाँव में यह संदेश लेकर जाते हैं कि हम अपनी पृथ्वी को सुरक्षित रखें, क्योंकि यही हमारे जीवन का आधार है।
स्वदेशी आचरण: लोकल को वोकल बनाना
“स्वदेशी अपनाना केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चरित्र का प्रतीक है।”
संघ का चौथा परिवर्तन “स्वदेशी आचरण” हमें आत्मनिर्भर भारत की दिशा में अग्रसर करता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी “वोकल फॉर लोकल” का नारा देकर इसी भावना को पुनर्जीवित किया है। परंतु यह विचार नया नहीं, संघ के मार्गदर्शक दत्तोपंत ठेंगड़ी जी ने दशकों पहले ही स्वदेशी को राष्ट्रीय पुनरुत्थान का आधार माना था।
ठेंगड़ी जी कहते थे “स्वदेशी कोई विकल्प नहीं, यह भारतीय आत्मा की अभिव्यक्ति है। जो देश अपने उत्पादों, अपनी परंपरा और अपने श्रम का सम्मान नहीं करता, वह आत्मनिर्भर नहीं हो सकता।” वे मानते थे कि स्वदेशी का अर्थ केवल देश में बने वस्त्र या उत्पाद खरीदना नहीं, बल्कि अपने समाज, अपने श्रमिक, अपने किसान, और अपने उद्योगपति के प्रति आस्था रखना है।
स्वामी विवेकानंद ने विदेशों में भारतीय संस्कृति की महानता को इस रूप में प्रस्तुत किया कि पश्चिमी समाज भी भारतीय चिंतन का प्रशंसक बन गया। उसी परंपरा में संघ आज यह प्रेरणा देता है कि हम विदेशी वस्तुओं की चकाचौंध में अपने शिल्प, अपनी मिट्टी और अपने उत्पादों को न भूलें। दीपावली पर स्वदेशी उत्पादों के दीप, सजावट और उपहारों का प्रयोग केवल अर्थव्यवस्था को नहीं, बल्कि आत्मगौरव को भी प्रज्ज्वलित करता है।
नागरिक कर्तव्य: राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी का दीप
संघ का पाँचवाँ परिवर्तन हमें यह स्मरण कराता है कि नागरिक होना केवल अधिकारों का उपभोग करना नहीं, बल्कि कर्तव्यों का पालन करना भी है। आज जब समाज में स्वार्थ और सुविधा की प्रवृत्तियाँ बढ़ रही हैं, तब नागरिक कर्तव्य की भावना को पुनर्जीवित करना अत्यंत आवश्यक हो गया है।
प्रत्येक नागरिक का धर्म है कि वह संविधान का पालन करे, राष्ट्रगान और तिरंगे का सम्मान करे, देश की एकता और अखंडता बनाए रखे, पर्यावरण की रक्षा करे, सार्वजनिक संपत्ति का संरक्षण करे और हिंसा से दूर रहे। यह भी उसका कर्तव्य है कि 6 से 14 वर्ष के बच्चों को शिक्षा दिलाने में सहयोग करे, और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाए।
जब हर नागरिक अपने कर्तव्यों का निष्ठा से पालन करेगा, तभी भारत सशक्त और समरस समाज बनेगा। दीपावली का दीप हमें यही प्रेरणा देता है कि हम अंधकार को दूर करें, केवल बाहर का नहीं, भीतर का भी। जब नागरिक अपने जीवन में अनुशासन, ईमानदारी और सेवा का दीप जलाएगा, तब राष्ट्र का प्रत्येक कोना प्रकाशित होगा।
दीपों से नहीं, परिवर्तन से जगमगाए भारत
आज संघ अपने शताब्दी वर्ष की ओर अग्रसर है। इस अवसर पर उसका यह संकल्प है कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति तक “पंच परिवर्तन” का संदेश पहुँचे ताकि केवल प्राकृत जगत ही नहीं, चेतना भी आलोकित हो। दीपावली के पांच दिवस केवल अनुष्ठान न रह जाएं, बल्कि समाजिक, पारिवारिक और राष्ट्रीय जागरण के पर्व बनें।
जब हम सामाजिक समरसता का दीप जलाएं, परिवार में संवाद का प्रकाश फैलाएं, प्रकृति के साथ प्रेम का दीप जलाएं, स्वदेशी का गौरव जगाएं और नागरिक कर्तव्यों के पालन का संकल्प लें, तब ही दीपावली का सच्चा अर्थ सार्थक होगा। जैसे दत्तोपंत ठेंगड़ी जी कहा करते थे “राष्ट्र की आत्मा जागृत हो जाए, तो हर दीप में भारत का उजाला दिखेगा।”
अस्तु, आइए इस दीपावली पर केवल घर नहीं, अपने हृदय, विचार और कर्म को भी प्रकाश से भर दें- क्योंकि जब एक दीप परिवर्तन का जलता है, तब हजारों दीप स्वयं प्रज्वलित हो जाते हैं।











