जबलपुर। एमपी हाईकोर्ट ने सरकारी अस्पतालों में कार्यरत इन-सर्विस डॉक्टरों को बड़ी राहत देते हुए कहा कि मेडिकल पोस्ट ग्रेजुएशन (पीजी) पूरा करने के बाद उन्हें ग्रामीण सेवा के लिए अलग से बॉन्ड भरने की जरूरत नहीं है। कोर्ट ने कहा कि यह शर्त नए अभ्यर्थियों पर लागू होती है। न कि सरकार की सेवा में कार्यरत डॉक्टरों पर।
यह फैसला जस्टिस विवेक रूसिया व जस्टिस प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने सुनाया। कोर्ट ने मप्र स्वायत्त मेडिकल एवं दंत स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम प्रवेश नियम 2017 की व्याख्या करते हुए कहा कि नियम 11 के तहत बॉन्ड की बाध्यता केवल नए उम्मीदवारों तक सीमित है। यह आदेश डॉण् दीपाली बैरवा की याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि उन्हें ग्रामीण सेवा बॉन्ड से मुक्त करें और मूल शैक्षणिक दस्तावेज लौटाए।
राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि डॉ दीपाली पहले से रतलाम में मेडिकल ऑफिसर के पद पर पदस्थ थीं। उन्हें पीजी के लिए एनओसी ग्रामीण सेवा की शर्त पर दी गई थी। हालांकि कोर्ट ने सिद्धांत रूप में इन.सर्विस डॉक्टरों को राहत दीए लेकिन तथ्य छिपाने और बिना अनुमति अवकाश पर जाने के आधार पर डॉ दीपाली की याचिका को निरस्त कर दिया। मेडिकल पढ़ाई या पीजी के बाद डॉक्टर को 1 वर्ष ग्रामीण क्षेत्र में सेवा अनिवार्य है। ऐसा न करने पर बॉन्ड की राशि चुकानी होती है। मप्र में यह राशि 10 से 30 लाख रुण् हैए जो कोर्स व नियमों के अनुसार तय होती है।









