Sunday, January 25, 2026
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गुरु पूर्णिमा 2025: विशेष संयोग में होगा गुरु पूजन, जानें पूजा की विधि और व्रत कथा

ऐस्ट्रो ऋचा श्रीवास्तव
ज्योतिष केसरी

सनातन धर्म में गुरुओं को विशेष महत्व दिया गया है। उनका स्थान देवताओं से भी ऊपर माना गया है। हमारे इन्हीं गुरुओं के सम्मान में आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा मनाई जाती है। इस पूर्णिमा को आषाढ़ी पूर्णिमा अथवा व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं। इस पूर्णिमा को हिंदू, बौद्ध और सिख सभी धर्म के लोग मिलजुल कर मनाते हैं। गुरु पूर्णिमा के दिन अपने गुरु की पूजा करने से अज्ञान का अंधकार मिटता है और जीवन करुणामय बनता है। “गु” का मतलब अंधेरा और “रू” का अर्थ है मिटा देने का भाव। जो अज्ञानता के अंधकार को मिटा दे, वही सच्चा गुरू होता है। गुरु पूर्णिमा के दिन हम ऐसे ही महान गुरुओं को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं।

विशेष है गुरु पूर्णिमा

इस बार गुरु पूर्णिमा गुरुवार 10 जुलाई 2025 को है। इस वर्ष की गुरु पूर्णिमा कुछ खास है। क्योंकि इस बार 10 जुलाई 2025 को गुरुवार और पूर्णमासी का विशेष संयोग बन रहा है। अतः इस दिन किये गए व्रत, पूजन आदि विशेष फलदाई होंगे।

पूजन का विधि-विधान

इस दिन प्रात: काल स्नान आदि से निवृत होकर अपने गुरु की सेवा में उपस्थित होकर अथवा अपने गुरु की तस्वीर को किसी ऊंचे आसन पर स्थापित करके पुष्प आदि अर्पित करें। उसके बाद संकल्प करके षोडशोपचार विधि से गुरु का पूजन करें। क्योंकि इस दिन गुरु की पूजा देवता के समान करने का विधान है। इस पर्व को श्रद्धा भाव से मनाकर गुरु को यथाशक्ति भेंट आदि अर्पण करें। फिर उनसे आशीर्वाद प्राप्त करें ताकि वह फलदायक हो। इसके अलावा शिष्य गुरु से विनम्रता पूर्वक जाने अनजाने में किए गए दुर्व्यवहार, अहंकार, प्रमाद, हिंसा या अन्य कोई ऐसी भूल, जो अनजाने में ही उनसे हो गई हो उस भूल के लिए  क्षमा मांगें  और अपने गुरु से आशीर्वाद प्राप्त करें। 

व्रत कथा 

महाभारत काल में हस्तिनापुर में  गङ्गभट्ट नाम का एक मछुआरा रहता था। एक दिन उसे नदी में बहुत भारी मछली प्राप्त हुई। उसने  जब घर ले जाकर मछली का पेट चीरा , तो उसमें से कन्या निकली। उस कन्या का नाम उसने सत्यवती रखा। मछली के पेट से जन्म लेने के कारण उसके शरीर से मछली की दुर्गंध निकलती रहती थी। एक बार पराशर मुनि उसकी नाव पर सवार हुए और नदी के पार जाने लगे। सत्यवती के सौंदर्य पर ऋषि मोहित हो गए और विवाह की कामना करते हुए सत्यवती से विवाह का प्रस्ताव रखा। सत्यवती ने अपने शरीर से आने वाली दुर्गंध के बारे में बताया और बोली कि वह विवाह नहीं कर सकती। उसके इस दोष को ऋषि पराशर ने अपने तपोबल से तुरंत दूर कर दिया। इस प्रकार ऋषि पराशर और देवी सत्यवती का विवाह हो गया। कुछ समय पश्चात उनकी संतान महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ। जन्म के समय ही बालक के सिर पर जटाएं थीं और उसने जनेऊ धारण किया हुआ था। उत्पन्न होते ही उसने अपने पिता को नमस्कार किया और हिमालय पर्वत पर चला गया। जहां पर वह बद्री वन और हिमालय की गुफाओं में कठोर तपस्या में लीन हो गया।

बाद में उन्होंने बद्री वन में रहते हुए अध्ययन- अध्यापन किया। जिससे उसका नाम  बाद्रायण के नाम से भी विख्यात हुआ। महर्षि वेद व्यास नें महाभारत के अलावा वेद, शास्त्र और पुराणों की भी रचना की। अपनी रचनाओं के माध्यम से वे पूरे विश्व के गुरु माने जाते हैं। गुरु पूर्णिमा को जन्मे महर्षि वेदव्यास के नामकरण पर ही इस तिथि को व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं। क्योंकि आदि शंकराचार्य को महर्षि व्यास का अवतार माना गया है इसलिए इस दिन साधु- सन्यासियों द्वारा आदि शंकराचार्य का पूजन किया जाता है।

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