प्रेम: सरिता सैल

सरिता सैल
कर्नाटक

प्रेम वो नहीं जो तुमने किया
अपनी सुविधा के अनुसार
बल्कि प्रेम वो था
जो तुम्हारे पास समय की
कमी के कारण
तुम्हारे आफिस की फाइलों में बंद रहा
और मैं दिन महीने साल दर साल प्रतीक्षारत रही

अक्सर शाम चाय चढ़ाते समय
जब मैं तुम्हे पूछा करती थी
आज कितनी बार चाय हो गई
तुम झूठ कहते थे हर बार
पर पूरे दिन की दिनचर्या में
जितनी बार तुम्हें याद करती
प्रत्येक बार एक बूंद चाय की
तुम्हारे होंठ से मेरे होंठों तक का
सफर तय करती

अलमारी में है आज भी खाली
लाल रंग की साड़ी की जगह
जितने फिक्र से टटोलती थी
तुम्हारा बटुवा
उतनी ही बेफिक्री से
प्रत्येक बार मांगती थी तुमसे
हर त्यौहार में घुले रंग की भाँति
पहनी साड़ी सी
तुम्हारे प्रिय रंगों को बदलता देख
मैं हर बार मुस्कुराती थी
मन ही मन

प्रेम वह था जो मैंने
अभावों में भी है जिया
तुम्हारे छोड़ कर चले जाने के बाद भी
उपहार में तुम्हारे दिये हुए
आंसुओं को
तुम्हारी बदनामी के भय से
कभी अपनी आंखों से बहने नहीं दिया
यद्यपि हृदय से उठती हुंकार पर
हर बार मेरे होठों पर
विरह का एक गीत रख दिया
और मैने उसे ही अपना
जीवन का संगीत मान लिया