Sunday, September 6, 2026
Homeसाहित्यआखिरी सेल्फ़ी -वंदना सहाय

आखिरी सेल्फ़ी -वंदना सहाय

शुक्ला जी मृत्यु शैय्या पर पड़े लगभग आखिरी साँसे ही गिन रहे थे। पत्नी का स्वर्गवास होने के बावजूद घर भरा-पूरा था-दो बेटे, एक बेटी। दामाद-बहुएँ, फिर उनके बाल-बच्चे। इनमें से जो कोई भी उनकी तबीयत के बारे में सुनता, आकर जरूर मिलता, लेकिन बड़े औपचारिक ढंग से। बस, उनका हाथ अपने हाथों में ले एक सेल्फ़ी ले लेता जैसे बस खानापूर्ती कर रहा हो।

लगातार अवसान की ओर अग्रसर होते हुए शरीर का मन अभी भी इतना चेतनशील था कि उसे यह बात चुभ रही थी कि जो अपने उनसे मिलने आ रहे हैं, वे बस अपनी महज उपस्थिति दर्ज करवाने के लिए उनका हाथ अपने हाथों में न थामें। भले हीं वे ज्यादा कुछ बोल न पाएँ, पर जो भी मिलने आएँ, वे सब सचमुच थोड़ी देर उनके लिए उनके पास बैठें।
पर वे सब अपने में तल्लीन कुछ ही देर में कमरे से बाहर निकल गहन भौतिकता के गहरे सागर में विलीन हो जाते।

बस कमरे में रह जाते शुक्ला जी मृत्यु का इंतज़ार करते हुए, कोने में कुर्सी पर ऊँघते हुए एक अटेंडेन्ट के साथ।
सबसे अंत में उनका सबसे छोटा और प्रिय बहुदेशीय कंपनी में काम करता हुआ बेटा, बड़ी मुश्किल से छुट्टी ले उन्हें देखने पहुँचा।

उसे देखते ही उनकी टूटती साँसें सबल हो उठीं। वे उससे बहुत सारी बातें साझा करना चाहते थे। साँसों के लगातार खाली हो रहे कोष में अभी भी उसके बातें करने के लिए उन्होंने कुछ साँसें बचा रखीं थीं। उन्होंनें साँसों में दम फूँक कर कुछ कहने की ज्यों ही कोशिश की, बेटे ने औरों की तरह ही सेल्फी लेने के लिए मोबाइल निकाला और उनकी ओर झुकते हुए कहा-“बस पापा एक मिनट”, और फोटो क्लिक कर दी। पर, बामुश्किल रुकी हुई साँसों को इतनी देर भी नागवार गुजरी और वे सदा के लिए रूठ गयीं। यह उसकी पिता के साथ आखिरी सेल्फ़ी थी।

Related Articles

Latest News