प्रकृति का महत्व- अतुल पाठक

प्रकृति जीवन का अनमोल तोहफ़ा है, जो न सिर्फ एक है अपितु उसमें कई चीजें समावेशित हैं जिनके बिना हम जीना तो छोड़ो जीने की कल्पना भी नहीं कर सकते। प्रकृति से ही हमें कई प्राकृतिक संसाधन मिले है, जिनसे न सिर्फ मानव जाति वरन जीव-जन्तु पशु-पक्षी सभी लाभप्रद होते हैं। इस प्रकृति में ही नदी, पर्वत, चाँद, तारे, सूरज, वृक्ष ये सभी आते हैं।
प्रकृति का आख़िर इतना महत्व क्यों है, ये चर्चा का विषय है। प्रकृति का दूसरा नाम पर्यावरण या वातावरण है। पर्यावरण का अर्थ है परि+आवरण अर्थात हमारे चारो ओर ढका हुआ आवरण। हम अपने चारो ओर जो कुछ भी देखते हैं वो सब प्रकृति का ही दिया हुआ है। प्रकृति के दिये हुए प्राकृत संसाधनों की महत्ता को जानना अत्यंत आवश्यक हो जाता है, क्योंकि मूर्ख मानव आज प्रकृति को भूल ही चुका है जैसे वो इसका अंग ही न हो।
आज अपने निजी स्वार्थ में अंधा होकर मनुष्य पेड़ कटवा देता है। जो हमें छाया देता है, जिससे हमें फल, फूल और सब्जी मिलती हैं। सबसे बड़ी बात पेड़ ही हमें प्राणवायु ऑक्सीजन देते हैं जो हमारे जीने के लिए बेहद ज़रूरी होती है।
आज जितना बड़ा शहर होता है, उतना ही जीना जैसे घुट-घुट कर मरना जीने के लिए। सुकून की हवा नहीं मिलती जैसे आप देखते हैं दिल्ली, मुंबई, आगरा बड़े बड़े शहर हैं, पर अगर देखा जाये तंग गलियों में इंसान सुकून की साँस तक नहीं ले सकता। इसमें सबसे बड़ा कारण है आधुनिकीकरण। आधुनिकता के मद में पेड़ पौधों को लगाया कम जाता है वरन काटा ज्यादा जाता है।
शहर से ज्यादा स्वस्थ वातावरण गाँव में मिलता है, वहाँ हरे भरे पेड़ पौधे की छाया में इंसान सुकून से रहता है और वहाँ ऑक्सीजन भी भरपूर मात्रा में मिल जाती है। आज सबसे ज्यादा ज़रूरत प्रकृति को बचाने की है।
आज इंसान नदियों में ही गंदगी फैला रहा है।
उसी में फैक्ट्री और घरों से निकलने वाला कूड़ा-करकट डाल रहा है, जिसके कारण नदी का पानी जो पहले कभी वरदान हुआ करता था आज विषैला हो गया है। गंगा नदी को ही ले लो उसका पानी अमृत के समान होता था और आज भी पूजा याचना में गंगाजल का अपना ही महत्व है उस गंगा माँ को भी मानव गंदा कर रहा है।
प्रकृति के हम अंग होकर भी प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। प्रकृति का संरक्षण करने की बजाय हम प्रकृति का विनाश करने पर तुले हुए हैं।
प्रकृति हमको कितना सबकुछ देती है जबकि हमसे कुछ भी नहीं लेती है। सिर्फ थोड़ा योगदान अगर मनुष्य करे जैसे वृक्षारोपण करना, वर्षा का जल संरक्षण और पशु-पक्षियों के प्रति थोड़ा दया भाव उनके लिए पानी और भोजन क्या इतना करना भी मनुष्य के लिए दुष्कर है। यक़ीन मानो प्रकृति की गोद हम सबके लिए सदा खुली रहती है, जिसमें सदा सुख और आनन्द उठाते हैं।
खिले हुए पुष्प हमें मुस्कुराना सिखाते हैं अपनी महक और खिलखिलाहट से उदास चेहरों को भी प्रफुल्लित कर देते हैं। उन पुष्पों के नन्हें नन्हें पौधों को हमें लगाना चाहिए। कवि सिर्फ वाह-वाही के लिए प्रकृति के लेख नहीं लिखता, बल्कि प्रकृति को आबाद रखने के लिए आप लोगों को जागरूक करता है और अपने लेख के माध्यम से प्रकृति को नमन करता है।
अपने-अपने घरों में घरेलू आवश्यकता से ज्यादा पानी खर्च करते हैं जो बड़ा ही दुख का विषय है। अगर पानी को इसी तरह बहाया गया तो! आने वाले समय में पानी भी पेट्रोल-डीजल की तरह सीमित संसाधन बन कर रह जाएगा। हमको पानी का महत्व भी समझना होगा। पानी हमारे लिए किसी अमृत से कम नहीं होता। आओ प्रण लें प्रकृति को बचाएँगे धरती को स्वर्ग बनाएँगे।

-अतुल पाठक
जनपद हाथरस, उत्तर प्रदेश
संपर्क- 7253099710