Monday, July 13, 2026
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MP High Court : बालिग को अपनी मर्जी से जीने का पूरा अधिकार, अदालतें नहीं बन सकतीं अभिभावक

MP High Court :  जबलपुर. एमपी हाईकोर्ट ने वयस्कता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर एक अह्र्म फैसला सुनाया है. जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने स्पष्ट किया कि बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद की जगह पर रहने और अपनी मर्जी के व्यक्ति के साथ जीवन बिताने का पूरा संवैधानिक अधिकार है.

यह मामला जबलपुर के रांझी क्षेत्र की एक मां द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से संबंधित था. मां ने आरोप लगाया था कि रितिक चौधरी नामक युवक उनकी बेटी को बहला-फुसलाकर ले गया है. याचिका पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के निर्देश पर पुलिस ने युवती को अदालत में पेश किया.

युगलपीठ ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए युवती से बंद कमरे में अकेले बातचीत कर उसका पक्ष जाना. बातचीत में युवती ने अदालत को बताया कि वह बालिग है और बिना किसी दबाव या अनुचित प्रभाव के अपनी मर्जी से रितिक के साथ गई थी. उसने अपने माता-पिता के साथ रहने से इनकार करते हुए युवक के साथ रहने की इच्छा व्यक्त की. युवती के इस बयान के बाद अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि उस पर कोई गैर-कानूनी पाबंदी नहीं है और वह अपनी इच्छा से जीवन जी रही है.

मर्जी के खिलाफ माता-पिता को नहीं सौंप सकते-

याचिका को खारिज करते हुए युगलपीठ ने स्पष्ट संदेश दिया कि अदालतें माता-पिता की भावनाओं या अहंकार से प्रेरित होकर सुपर गार्जियन की भूमिका नहीं निभा सकतीं. कोर्ट ने कहा कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका केवल तभी लागू होती है जब गैर-कानूनी हिरासत साबित हो. इसलिए, किसी बालिग को उसकी मर्जी के खिलाफ माता-पिता के सुपुर्द नहीं किया जा सकता.

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