Thursday, July 16, 2026
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Hydrogen train से बदलेगी भारतीय रेल की तस्वीर, पीएम मोदी करेंगे शुरुआत

Hydrogen train : भारतीय रेलवे के इतिहास में शुक्रवार का दिन एक ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में दर्ज होने जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हरियाणा के जींद–सोनीपत रेलखंड पर देश की पहली हाइड्रोजन फ्यूल सेल आधारित यात्री ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर रवाना करेंगे।
इस पहल के साथ भारत उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल हो जाएगा, जहां हाइड्रोजन ऊर्जा से संचालित यात्री रेल सेवाएं उपलब्ध हैं। भारतीय रेलवे के अनुसार, यह परियोजना स्वच्छ ऊर्जा, हरित परिवहन और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के विजन को साकार करने की दिशा में एक बड़ा और मील का पत्थर साबित होने वाला कदम है।

भारतीय रेलवे द्वारा विकसित यह अत्याधुनिक 10 कोच वाली हाइड्रोजन ट्रेन लगभग 2600 यात्रियों को एक साथ यात्रा कराने में सक्षम है. रेलवे के अनुसार यह दुनिया की सबसे बड़ी हाइड्रोजन संचालित यात्री ट्रेनों में से एक है. पारंपरिक डीजल या ओवरहेड बिजली लाइन से संचालित ट्रेनों के विपरीत यह ट्रेन अपने साथ मौजूद हाइड्रोजन फ्यूल सेल प्रणाली के माध्यम से स्वयं बिजली उत्पन्न करेगी.

इस प्रक्रिया में हाइड्रोजन और वातावरण में मौजूद ऑक्सीजन की रासायनिक क्रिया से ऊर्जा पैदा होगी, जबकि उत्सर्जन के रूप में केवल जलवाष्प और ऊष्मा निकलेगी. यही कारण है कि इसे पर्यावरण के लिए अत्यंत अनुकूल और भविष्य की स्वच्छ परिवहन तकनीक माना जा रहा है.

देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन का संचालन प्रारंभिक चरण में उत्तर रेलवे के जींद-सोनीपत रेलखंड पर किया जाएगा. लगभग 89 किलोमीटर लंबे इस मार्ग पर ट्रेन जींद जंक्शन, जींद सिटी, पांडू पिंडारा जंक्शन, ललित खेड़ा हॉल्ट, भांभेवा, इसापुर खेड़ी हॉल्ट, बुटाना हॉल्ट, खंडराई हॉल्ट, रबरा हॉल्ट, लाठ हॉल्ट, मोहाना, बरवासनी हॉल्ट, सोनीपत न्यू और सोनीपत जंक्शन सहित कई स्टेशनों एवं हॉल्ट पर यात्रियों को सुविधा प्रदान करेगी.

इस मार्ग का चयन इसलिए किया गया है ताकि नियमित परिचालन के दौरान हाइड्रोजन आधारित ट्रेन की कार्यक्षमता, सुरक्षा और विश्वसनीयता का व्यावहारिक परीक्षण किया जा सके.

यह ट्रेन प्रोटॉन एक्सचेंज मेम्ब्रेन (पीईएम) फ्यूल सेल तकनीक पर आधारित है. ट्रेन के दोनों सिरों पर दो हाइड्रोजन ड्राइविंग पावर कार लगाए गए हैं, जबकि बीच में आठ यात्री कोच हैं. प्रत्येक पावर कार लगभग 1200 किलोवाट अर्थात करीब 1600 हॉर्स पावर ऊर्जा उत्पन्न करने में सक्षम है.

ट्रेन की डिजाइन गति 110 किलोमीटर प्रति घंटा रखी गई है, हालांकि पायलट परियोजना के दौरान इसे अधिकतम 75 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से संचालित किया जाएगा. रेलवे अधिकारियों का कहना है कि परीक्षण सफल रहने के बाद भविष्य में इसकी परिचालन क्षमता और गति दोनों बढ़ाई जा सकती हैं.

इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए हरियाणा के जींद में देश का सबसे बड़ा रेलवे हाइड्रोजन रीफ्यूलिंग स्टेशन भी स्थापित किया गया है. इस संयंत्र में इलेक्ट्रोलिसिस तकनीक के माध्यम से हाइड्रोजन गैस तैयार की जाती है, जिसे 500 बार दबाव पर संपीड़ित कर 350 बार दबाव के साथ ट्रेन में भरा जाता है.

इस अत्याधुनिक सुविधा की मदद से ट्रेन के दोनों पावर कारों में एक साथ ईंधन भरा जा सकता है. संयंत्र में लगभग 3000 किलोग्राम हाइड्रोजन संग्रहित करने की क्षमता है, जिससे नियमित ट्रेन संचालन संभव हो सकेगा. रेलवे के अनुसार यह भारत का पहला एकीकृत रेलवे हाइड्रोजन पारिस्थितिकी तंत्र है, जिसमें हाइड्रोजन उत्पादन, भंडारण, संपीड़न, ईंधन आपूर्ति और ट्रेन संचालन की संपूर्ण व्यवस्था एक ही स्थान पर विकसित की गई है.

भारतीय रेलवे का कहना है कि हाइड्रोजन ट्रेन परियोजना देश में हरित ऊर्जा आधारित परिवहन व्यवस्था को नई दिशा देगी. इससे डीजल पर निर्भरता कम होगी और कार्बन उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी आएगी. रेलवे पहले ही अपने ब्रॉड गेज नेटवर्क के 99 प्रतिशत से अधिक हिस्से का विद्युतीकरण कर चुका है.

अब हाइड्रोजन आधारित ट्रेनें स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में अगले बड़े कदम के रूप में देखी जा रही हैं. यह परियोजना राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन और भारत के वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन के लक्ष्य को प्राप्त करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी.

दुनिया के कई देशों जैसे जर्मनी, फ्रांस, इटली, चीन और जापान में हाइड्रोजन ट्रेनें पहले से संचालित हो रही हैं या परीक्षण के दौर में हैं, लेकिन उनमें अधिकांश ट्रेनें केवल दो से चार डिब्बों वाली हैं और सीमित क्षेत्रीय सेवाओं के लिए उपयोग की जाती हैं. भारतीय रेलवे की 10 कोच वाली ट्रेन क्षमता और तकनीकी दृष्टि से इन ट्रेनों से कहीं अधिक बड़ी मानी जा रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह परियोजना भविष्य में लंबी दूरी और अधिक यात्री क्षमता वाली हाइड्रोजन ट्रेनों के संचालन का मार्ग प्रशस्त करेगी.

इस पूरी परियोजना का विकास स्वदेशी तकनीक के आधार पर किया गया है. रिसर्च डिजाइन्स एंड स्टैंडर्ड्स ऑर्गेनाइजेशन (आरडीएसओ) ने तकनीकी डिजाइन और मानकों को विकसित किया, मेधा सर्वो ड्राइव्स ने ट्रेन का एकीकरण किया, जबकि इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (आईसीएफ) ने ट्रेन का बाहरी डिजाइन तैयार किया. रेलवे अधिकारियों के अनुसार भविष्य में कालका-शिमला जैसी विरासत रेल लाइनों सहित अन्य चयनित मार्गों पर भी हाइड्रोजन ट्रेनें चलाने की योजना पर कार्य किया जा रहा है.

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन केवल एक नई रेल सेवा नहीं, बल्कि स्वच्छ ऊर्जा, आधुनिक तकनीक और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है. यदि यह पायलट परियोजना सफल रहती है तो आने वाले वर्षों में भारतीय रेलवे के कई अन्य मार्गों पर भी हाइड्रोजन आधारित ट्रेनों का संचालन शुरू किया जा सकता है, जिससे देश का रेल परिवहन अधिक पर्यावरण अनुकूल, ऊर्जा दक्ष और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप बन सकेगा

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