रक्षा खरीद परिषद (DAC) ने फ्रांस से 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद को मंजूरी दे दी है। यह सौदा करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये का है और भारत के इतिहास की सबसे बड़ी रक्षा डील माना जा रहा है। साथ ही अमेरिका से 6 अतिरिक्त P-8I टोही विमान खरीदने को भी हरी झंडी मिली है।
लेकिन इस फैसले के बाद सबसे बड़ा सवाल उठ रहा है—क्या राफेल की यह खरीद देसी तेजस मार्क-2 प्रोग्राम की कीमत पर हो रही है?
IAF की मौजूदा स्थिति: जरूरत कितनी बड़ी है?
भारतीय वायुसेना के लिए 42 स्क्वाड्रन स्वीकृत हैं, जबकि वर्तमान में केवल करीब 30 स्क्वाड्रन ही ऑपरेशनल हैं। यानी 12 से अधिक स्क्वाड्रन की कमी है।
एक स्क्वाड्रन में औसतन 18 विमान होते हैं। यदि भविष्य में जरूरत 60–65 स्क्वाड्रन तक बढ़ाई जाती है, तो भारत को आने वाले वर्षों में कम से कम 400 नए लड़ाकू विमानों की आवश्यकता होगी।
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180 तेजस मार्क-1A का ऑर्डर पहले ही दिया जा चुका है (लगभग 1.15 लाख करोड़ रुपये)।
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114 राफेल की नई डील से लगभग 6 स्क्वाड्रन बनेंगे।
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अगले 10 वर्षों में कई पुराने स्क्वाड्रन रिटायर भी होंगे।
इस हिसाब से तेजस मार्क-1A और राफेल के बाद भी भारत को 200–250 अतिरिक्त विमानों की जरूरत पड़ेगी।
तेजस मार्क-2: देसी ‘मीडियम वेट’ फाइटर
तेजस मार्क-2, डीआरडीओ की एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) द्वारा विकसित 4.5 पीढ़ी का मीडियम वेट फाइटर जेट है। इसे मिग-29, मिराज-2000 और जैगुआर जैसे विमानों को रिप्लेस करने के लिए डिजाइन किया गया है।
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प्रोटोटाइप तैयार हो रहा है।
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टेस्ट फ्लाइट 2026–27 के आसपास शुरू होने की उम्मीद।
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प्रोडक्शन 2029 के बाद शुरू करने की योजना।
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120 यूनिट खरीदने की संभावित योजना।
हालांकि, यह विमान GE F-414 इंजन पर आधारित है। तेजस मार्क-1A के इंजन की डिलीवरी में पहले ही देरी हो चुकी है, जिससे उत्पादन प्रभावित हुआ है। ऐसे में मार्क-2 की समयबद्ध प्रगति इंजन सप्लाई पर निर्भर करेगी।
राफेल को प्राथमिकता क्यों?
राफेल एक 4.5+ जेनरेशन का हैवीवेट मल्टी-रोल फाइटर है, जो कई मामलों में पांचवीं पीढ़ी के विमानों के करीब प्रदर्शन करता है।
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यह पहले से भारतीय वायुसेना में ऑपरेशनल है।
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लॉजिस्टिक्स, ट्रेनिंग और मेंटेनेंस का इकोसिस्टम तैयार है।
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तत्काल परिचालन जरूरतों को पूरा करने में सक्षम है।
राफेल की डिलीवरी भी 2029–30 के आसपास शुरू होने की संभावना है, जो तेजस मार्क-2 की संभावित टाइमलाइन से मेल खाती है। लेकिन फर्क यह है कि राफेल एक प्रूवन प्लेटफॉर्म है, जबकि तेजस मार्क-2 अभी विकास चरण में है।
रणनीतिक रूप से, दोनों की भूमिकाएं अलग हैं—
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राफेल: हैवी स्ट्राइक और मल्टी-डोमेन मिशन
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तेजस मार्क-2: मीडियम वेट रिप्लेसमेंट और स्क्वाड्रन संख्या बढ़ाना
इसलिए इन्हें एक-दूसरे का विकल्प नहीं, बल्कि पूरक माना जा रहा है।
एम्का (AMCA): पांचवीं पीढ़ी की दिशा
भारत समानांतर रूप से एम्का (AMCA), यानी देसी पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट पर भी काम कर रहा है।
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पांच प्रोटोटाइप के निर्माण की प्रक्रिया शुरू।
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निजी कंपनियों को शामिल किया गया है।
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लक्ष्य: 2035 तक IAF में शामिल करना।
फंडिंग पर सवाल: क्या तेजस को होगा नुकसान?
आलोचकों का तर्क है कि 3.25 लाख करोड़ रुपये की राफेल डील के बाद वायुसेना के बजट पर दबाव बढ़ेगा और देसी प्रोग्राम प्रभावित हो सकते हैं।
हालांकि सरकार पहले ही तेजस मार्क-2 प्रोग्राम के लिए लगभग 40 हजार करोड़ रुपये की स्वीकृति दे चुकी है। रक्षा बजट का आवंटन चरणबद्ध तरीके से होता है, इसलिए एक परियोजना के चलते दूसरी के रुकने की आशंका फिलहाल स्पष्ट नहीं है।











