बाड़मेर की साध्वी प्रेम बाईसा की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत का रहस्य तीसरे दिन भी बरकरार है। अब तक न तो मौत के कारणों का खुलासा हो पाया है और न ही जांच से कोई ठोस जवाब सामने आया है। इस बीच, उनके पैतृक गांव परेउ में पूरे विधि-विधान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। अंतिम यात्रा में बड़ी संख्या में ग्रामीण, अनुयायी और श्रद्धालु शामिल हुए।
संघर्षों में बीता बचपन, पिता ट्रक ड्राइवर
साध्वी प्रेम बाईसा का जीवन संघर्ष, साधना और भक्ति से भरा रहा। उनके पिता विरमनाथ पेशे से ट्रक ड्राइवर थे। बेहद साधारण परिवार में जन्मी प्रेम बाईसा को कम उम्र में ही जीवन की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। महज 5 साल की उम्र में उनकी मां अमरु बाईसा का निधन हो गया, जिससे उनका बचपन अभावों के बीच बीता।
4 साल की उम्र में भक्ति की ओर झुकाव
बताया जाता है कि प्रेम बाईसा मात्र 4 साल की उम्र से ही भक्ति भाव में रमने लगी थीं। माता-पिता को पूजा-पाठ और साधना करते देख वे भी भक्ति में डूबी रहती थीं। चौमासा के दौरान पूरा परिवार जोधपुर स्थित गुरुकृपा आश्रम पहुंचा, जहां भक्ति का वातावरण उनके जीवन की दिशा तय करने लगा।
संतों के सानिध्य में मिली आध्यात्मिक शिक्षा
मां के निधन के बाद प्रेम बाईसा ने आश्रम में संत राजाराम और संत कृपाराम महाराज के सानिध्य में रहकर कथा वाचन, भजन गायन और आध्यात्मिक शिक्षा ग्रहण की। कम उम्र में ही उनकी वाणी और आध्यात्मिक समझ लोगों को प्रभावित करने लगी।
12 साल की उम्र में पहली कथा, बनीं पहचान
प्रेम बाईसा ने मात्र 12 साल की उम्र में जोधपुर के पास अपनी पहली कथा की। उनकी सरल भाषा, प्रभावशाली शैली और आध्यात्मिक संदेशों ने उन्हें जल्दी ही लोकप्रिय बना दिया। धीरे-धीरे वे साध्वी के रूप में पहचानी जाने लगीं और बड़ी संख्या में श्रद्धालु उनसे जुड़ते चले गए।
अंतिम संस्कार के बाद शांति, लेकिन सवाल बरकरार
एक ओर गांव में अंतिम संस्कार के बाद शांति का माहौल है, तो दूसरी ओर साध्वी प्रेम बाईसा की मौत से जुड़े कई सवाल अब भी लोगों के मन में उठ रहे हैं। हर किसी की निगाहें अब जांच एजेंसियों पर टिकी हैं, ताकि इस रहस्य से जल्द पर्दा उठ सके।











