Saturday, April 25, 2026
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हाईकोर्ट ने कर्मचारी के वेतन वृद्धि मामले में नगर निगम आयुक्त पर 10 हजार रुपये का लगाया जुर्माना

प्रयागराज (हि.स.)। नगर निगम के कर्मचारी के एक वर्ष की वेतन वृद्धि न करने के मामले में नगर निगम आयुक्त के रवैये पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नाराजगी जताई। कोर्ट ने मेरठ नगर निगम आयुक्त पर 10 हजार रूपये का जुर्माना लगाते हुए कहा कि नगर आयुक्त गोद में बैठा बच्चा नहीं है, जो निदेशक से मामले में आगे की कार्रवाई के लिए निर्देश मांगे।

कोर्ट ने नगर आयुक्त को भविष्य में सावधान रहने की चेतावनी भी दी। साथ ही यूपी सरकार को भी निर्देश दिए। कहा कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट द्वारा दिए गए निर्णय सरकारी आदेशों या नियमों पर विचार करने के बाद दिए जाते हैं। ऐसे निर्णयों के अनुपालन में लापरवाही से काम न करें।

कोर्ट ने कहा कि नगर आयुक्त ने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के दिए गए आदेशों को नजरअंदाज किया और सरकारी आदेशों के अनुसार चलना और सरकार से निर्देश लेना उचित समझा। लिहाजा, ऐसी कार्रवाई को आगे न बढ़ाया जाय। यह आदेश न्यायमूर्ति जेजे मुनीर ने श्रीपाल की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है।

कोर्ट ने मामले में मेरठ नगर आयुक्त द्वारा पारित आदेश को रद्द कर दिया। इसके साथ ही याची को एक जुलाई 2018 से काल्पनिक रूप से वार्षिक वेतन वृद्धि देने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि याची को संशोधित वेतनमान का भुगतान आठ सप्ताह के भीतर किया जाए। साथ ही एरियर की रकम को छह प्रतिशत की वार्षिक ब्याज की दर से भुगतान किया जाए।

मामले में याची नगर निगम मेरठ में बाबू था। रिटायरमेंट के बाद उसने नगर आयुक्त को एक जुलाई 2018 से तीस जून 2019 की अवधि के लिए अपनी वेतन वृद्धि की मांग की। इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई तो याची ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने नगर आयुक्त को काल्पनिक वेतन वृद्धि के दावे पर विचार करने का निर्देश जारी किया। नगर आयुक्त ने दावे को खारिज कर दिया। कहा कि वेतन वृद्धि केवल सेवारत कर्मचारियों को दिया जाता है। जबकि याची सेवानिवृत्त हो चुका है। इसलिए वह वेतनवृद्धि का हकदार नहीं है। इस पर हाईकोर्ट ने यह फैसला सुनाया।

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