Wednesday, July 22, 2026
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High Court : संदेह का लाभ मिलना आरोपी का कानूनी अधिकार

जबलपुर. मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल संदेह के आधार पर किसी भी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने कहा कि आपराधिक न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत यह है कि आरोप सिद्ध करने की पूरी जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष की होती है और अपराध तब तक साबित नहीं माना जा सकता, जब तक उसे संदेह से परे ठोस एवं विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर प्रमाणित न कर दिया जाए।

न्यायालय ने यह भी दोहराया कि संदेह का लाभ आरोपी का वैधानिक अधिकार है और कमजोर या अपूर्ण साक्ष्यों के आधार पर किसी को सजा नहीं दी जा सकती। इसी महत्वपूर्ण टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने नारकोटिक्स एक्ट से जुड़े एक मामले में राज्य शासन द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए निचली अदालत के निर्णय को बरकरार रखा और निष्पक्ष न्याय तथा साक्ष्य आधारित न्यायिक प्रक्रिया के महत्व को रेखांकित किया।

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति आर.के. वाणी की एकलपीठ में हुई. अदालत ने अपने आदेश में कहा कि दोषमुक्ति के विरुद्ध दायर अपील में उच्च न्यायालय तभी हस्तक्षेप कर सकता है, जब उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपी का अपराध सिद्ध होना ही एकमात्र तार्किक निष्कर्ष हो. यदि साक्ष्यों में संदेह, विरोधाभास या अन्य संभावनाएं मौजूद हों, तो आरोपी को संदेह का लाभ देना कानूनन आवश्यक है.

 

प्रकरण दमोह जिले के पथरिया थाना क्षेत्र से संबंधित है. पुलिस के अनुसार वाहन चेकिंग अभियान के दौरान रमेश सिंह, गणेश सिंह लोधी और काका उर्फ सुशील को मोटरसाइकिल की डिक्की में गांजा ले जाते हुए पकड़ा गया था. पुलिस ने तीनों आरोपियों के खिलाफ नारकोटिक्स एक्ट के तहत मामला दर्ज कर कार्रवाई की थी. हालांकि सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट ने अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया था.

ट्रायल कोर्ट के इसी आदेश को चुनौती देते हुए राज्य शासन ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी. शासन का तर्क था कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों को दोषी ठहराया जाना चाहिए था. लेकिन सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का गहन परीक्षण किया और पाया कि मामले में कई महत्वपूर्ण कमियां और विरोधाभास मौजूद हैं.

अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष का एक स्वतंत्र गवाह अपने पूर्व कथन से मुकर गया था, जबकि दूसरे स्वतंत्र गवाह से पूछताछ ही नहीं की गई. ऐसे में मामले में मुख्य रूप से केवल विभागीय गवाहों के बयान ही उपलब्ध थे. न्यायालय ने माना कि स्वतंत्र गवाहों का समर्थन न मिलना अभियोजन के मामले को कमजोर करता है.

सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि मामले के प्रमुख गवाह तत्कालीन उप निरीक्षक जे.पी. वर्मा के बयान और अन्य पुलिसकर्मियों के बयानों में गंभीर विरोधाभास थे. एक ओर उप निरीक्षक ने कहा कि पुलिस सामान्य वाहन चेकिंग के लिए मौके पर पहुंची थी और उन्हें गांजा मिलने की कोई पूर्व सूचना नहीं थी, वहीं दूसरे पुलिसकर्मी ने अदालत को बताया कि उन्हें पहले से ही सूचना प्राप्त हो चुकी थी. इस प्रकार के विरोधाभासों ने अभियोजन की कहानी पर सवाल खड़े कर दिए.

हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि गवाह मोटरसाइकिल की कंपनी, रंग, पंजीयन क्रमांक और यहां तक कि डिक्की के रंग जैसी बुनियादी जानकारियां भी नहीं बता सके. इतना ही नहीं, गवाहों ने स्वीकार किया कि उनकी उपस्थिति में केवल कथित गांजे की जांच हुई थी, लेकिन नमूना लेने की प्रक्रिया नहीं की गई थी. अदालत ने माना कि ऐसे महत्वपूर्ण तथ्यों में अस्पष्टता और विरोधाभास अभियोजन के मामले को संदेहास्पद बनाते हैं.

इन सभी परिस्थितियों पर विचार करने के बाद न्यायमूर्ति आर.के. वाणी की एकलपीठ ने निष्कर्ष निकाला कि ट्रायल कोर्ट द्वारा दिया गया दोषमुक्ति का आदेश तथ्यों और साक्ष्यों के अनुरूप है. अदालत को उसमें हस्तक्षेप करने का कोई ठोस आधार नहीं मिला. परिणामस्वरूप राज्य शासन की अपील निरस्त कर दी गई.

हाईकोर्ट के इस फैसले को आपराधिक न्याय व्यवस्था में ‘संदेह का लाभ’ सिद्धांत की पुनः पुष्टि के रूप में देखा जा रहा है. अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि न्यायालय का उद्देश्य केवल अपराधियों को दंडित करना नहीं, बल्कि निर्दोष व्यक्तियों को गलत सजा से बचाना भी है. इसलिए जब तक अपराध पूरी तरह प्रमाणित न हो जाए, तब तक किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता.

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