Friday, April 24, 2026
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महाशिवरात्रि 2025: ज्योतिषीय महत्व, पूजन एवं जलाभिषेक का मुहूर्त तथा व्रत कथा

एस्ट्रो ऋचा श्रीवास्तव
ज्योतिष केसरी

हिन्दू पंचांग के अनुसार यूं तो वर्ष के प्रत्येक मास के सभी 12 कृष्णपक्षों की चतुर्दशी तिथि पर शिवरात्रि होती है, किंतु फाल्गुन माह के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि को “महाशिवरात्रि” के नाम से पुकारा गया है और हमारे पुराणों में “महा शिवरात्रि” का बड़ा महात्म्य बताया गया है।

लिंग पुराण के अनुसार इसी दिन ही भगवान महादेव नें स्वयं को निराकार रूप से विलग होकर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट किया था। ऐसी भी मान्यता है कि इसी दिन भगवान आशुतोष शिव नें समुद्र-मंथन से निकले हलाहल विष का पान कर उसे अपने कंठ में स्थापित कर लिया और नीलकण्ठ महादेव कहलाए। शिव पुराण की प्रचलित मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान शिव नें माता पार्वती से विवाह किया था, तब सभी भक्त गणों नें रात्रि जागरण कर उत्सव मनाया था। अतः यह महा शिवरात्रि मनाने की परंपरा पड़ी। लगभग सभी पुराणों में महाशिवरात्रि के पावन पर्व का विवरण मिलता है।

शिवरात्रि में सत, रज और तम सभी तीनो गुणों का सुंदर संतुलन स्थापित किया जाता है और समस्त शिव परिवार के पूजन-अर्चन, जप, व्रत तथा दान कर्म से मोक्ष की कामना की जाती है।

पूजन मुहूर्त

पंचांगों के अनुसार फागुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि बुधवार 26 फरवरी को सुबह 11:08 बजे से शुरू होगी और दूसरे दिन गुरुवार 27 फरवरी को सुबह 8:54 बजे समाप्त होगी। महाशिवरात्रि में रात्रि के पूजन का विधान है, इसलिए 26 फरवरी की रात में महादेव का पूजन किया जाएगा। पैसे तो 26 फरवरी से लेकर 27 फरवरी की सुबह तक पूजा और हवन इत्यादि चलते रहेंगे।

हिन्दू पंचांग के अनुसार महाशिवरात्रि पर भगवान शिव की पूजा के लिए निशिता काल पूजा का समय 26 फरवरी की अर्द्धरात्रि यानि 27 फरवरी को 12:09 (AM) बजे से 12:59 (AM) बजे अवधि 50 मिनट तक रहेगा।

सूर्यास्त के पश्चात जन्म मुहूर्त

1-प्रथम प्रहर के पूजन बुधवार 26 फरवरी को शाम 6:19 (PM) बजे से लेकर रात 9:26 (PM) बजे तक।

2-द्वितीय प्रहर के पूजन का समय 26-27 फरवरी को रात 9:26 (PM) बजे से 27 फरवरी की अर्धरात्रि 12:34 (AM) बजे तक।

3-तृतीय प्रहर के पूजन का समय 26-27 फरवरी को अर्धरात्रि 12:34 (AM) बजे से तड़के 3:41 (AM) बजे तक।

4-चतुर्थ पर प्रहर के पूजन का समय 27 फरवरी को प्रातः 3:41 (AM) बजे से सुबह 6:45 (AM) बजे तक।

महादेव पर जलाभिषेक का मुहूर्त

महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव महादेव पर जलाभिषेक का विशेष महत्व है। बुधवार 26 फरवरी 2025 को जलाभिषेक के निम्नलिखित मुहूर्त है-

प्रथम मुहूर्त सुबह 6:45 बजे से सुबह 9:42 बजे तक जल चढ़ाया जा सकता है।

द्वितीय मुहूर्त में सुबह 11:06 बजे से लेकर दोपहर 12:35 बजे तक जल चढ़ाया जा सकता है।

तृतीय मुहूर्त में दोपहर 3:25 बजे से शाम 6:10 बजे तक भी जलाभिषेक किया जा सकता है।

चतुर्थ मुहूर्त में रात 9 बजे से लेकर रात 12:01 बजे तक जलाभिषेक किया जा सकता है।

ज्योतिषीय दृष्टिकोण से महाशिवरात्रि पर्व का महत्व

इस बार की शिवरात्रि विशेष महत्व इसलिए है कि, इस वर्ष लगभग 144 वर्षों बाद लगने वाले कुंभ महापर्व का अंतिम स्नान शिवरात्रि की अमावस्या पर होगा। चूंकि चतुर्दशी तिथि के स्वामी स्वयं भगवान शिव ही है, इसीलिए प्रत्येक माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मासिक शिवरात्रि के नाम से जाना जाता है और फागुन माह की चतुर्दशी तिथि को महाशिवरात्रि के नाम से जाना जाता है।

इस तिथि को अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि इस समय सूर्य उत्तरायण भी हो चुके होते हैं और ऋतु परिवर्तन भी हो रहा होता है। चतुर्दशी तिथि के समय चंद्रमा कमजोर स्थिति में होते हैं और क्योंकि भोलेनाथ स्वयं चंद्रमा को अपने माथे पर किए हुए हैं, इसलिए भगवान भोलेनाथ की पूजा से चंद्रमा भी प्रबल होकर शुभ फल देते हैं।

सभी राशियों के लिए नवग्रह जनित पीड़ा, शनि की ढैया, साढ़े साती, महादशा, अन्तर्दशा, राहु-केतु की पीड़ा, कालसर्प दोष, पितृ दोष आदि का शमन इस दिन किये रुद्राभिषेक, शिव के मंत्रों के जाप से आसानी से किया जा सकता है। इस दिन शिवलिंग पे अभिषेक करते समय श्री सूक्त तथा रूद्र सूक्त का पाठ करना विशेष फलदाई होगा।

शिवरात्रि व्रत के पूजन की कथा

शिव महापुराण के अनुसार बहुत वर्ष पहले अर्बुद देश में सुंदर सेन नामक एक निषाद राजा रहता था। वह एक बार जंगल में अपने कुत्तों के साथ शिकार करने गया। पूरे दिन परिश्रम के बाद भी उसे कोई जानवर नहीं मिला, तो भूख प्यास से पीड़ित होकर वह रात्रि में जलाशय के तट पर एक बिल्व वृक्ष के पास जा पहुंचा। जहां उसे शिवलिंग के दर्शन हुए। अपने शरीर की रक्षा करने के लिए निषाद राज नें एक बिल्व वृक्ष की आड़ ले ली। इस क्रम में उस वृक्ष के पत्ते टूट कर शिवलिंग पर जा गिरे। तब उसने उन पत्तों को हटाकर शिवलिंग के ऊपर स्थित धूल को दूर करने के लिए जल से शिवलिंग को साफ कर दिया। तभी उसके तरकश एक बाण निकल कर शिवलिंग के पास गिर गया। उस बाण को उठाने के लिए उसने शिवलिंग के पास घुटने भी टेके और सर भी झुकाया। इस प्रकार अनायास ही रात्रि जागरण, शिवलिंग का अभिषेक स्पर्श और पूजन भी हो गया। कुछ समय पश्चात जब निषाद राज की मृत्यु हुई तब यमराज के दूत उसको पाश में बांधकर यमलोक ले जाने लगे। तब शिव जी के गणों नें युद्ध करके उसे निषाद को यम पाश से मुक्त करा लिया। इस प्रकार से वह निषादराज अपने कुत्तों के साथ शिव के प्रिय गणों में शामिल हो गया। इस प्रकार शिवरात्रि के पावन पूजन से मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है और शिव की कृपा मिलती है।

पूजा विधि

शिवपुराण में रात्रि के चारों प्रहर में शिव पूजा का विधान है। उपवास रखने वाले को फल, फूल, चंदन, बिल्व पत्र, धतूरा, धूप व दीप से रात के चारों प्रहर में शिवजी की पूजा करनी चाहिए, साथ ही भोग भी लगाना चाहिए। इसके साथ ही दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से अलग-अलग तथा सबको एक साथ मिलाकर पंचामृत से शिवलिंग को स्नान कराकर जल से अभिषेक करें। चारों प्रहर की पूजा में शिवपंचाक्षर मंत्र यानी ‘ॐ नम: शिवाय’ का जाप करें। अगले दिन प्रातः स्नान कर भगवान शिव की पूजा करने के बाद व्रत का पारण करना चाहिए।

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