
ज्योतिष केसरी
नागों की पूजा-आराधना का हमारे हिन्दू सनातन धर्म में प्राचीन काल से ही प्रचलन है। ऐसी मान्यता है कि नाग पंचमी के दिन नाग देवता का पूजन करने से वह प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं और उसके कारण हमारी सात पीढ़ी तक को सर्पदंश का भय नहीं रहता। यूं तो अनादि काल से ही देवताओं के साथ नागों के अस्तित्व के संदर्भ मिलते हैं। वराह पुराण, स्कंद पुराण, लिंग पुराण समेत अनेक पुराणों में नागों के संबंध में विविध वर्णन किया गया है। यहां तक की नागों के संसार को नाग लोक का नाम दिया गया है और उन्हें देवताओं के समकक्ष रखा गया है। देवताओं की माता अदिति की सगी बहन कद्रू के पुत्र होने के कारण नाग देवताओं के छोटे भाई माने जाते हैं।
हमारी पृथ्वी का भार शेषनाग के फन के ऊपर स्थित है। भगवान विष्णु ने भी शेषनाग को अपनी शैय्या बनाकर विश्व कल्याण का कार्य पूरा किया है। समुद्र मंथन नागराज बासुकि के बिना असंभव था। भगवान शिव के गले में भी वासुकी नाग का निवास है और उनके शरीर पर भी अनेक विषधर सर्प उनके शरीर की शोभा बढ़ाते हैं। इसीलिए भगवान शिव का एक नाम नागेंद्रहाराय भी है।
नाग पंचमी के प्रारंभिक इतिहास के संबंध में वराह पुराण में लिखा है कि सृजन शक्ति के अधिष्ठाता ब्रह्मा जी ने शेषनाग को सृष्टि कार्य में जनकल्याण हेतु अलंकृत किया था। तब से इस पर्व को इस नाग जाति के प्रति श्रद्धा प्रदर्शित करने का प्रतीक मान लिया गया है। यजुर्वेद में भी नागों और उनके पूजन का उल्लेख है। इस व्रत का महत्व पढ़ने या सुनने मात्र से ही समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।
वास्तव में नाग कृषकों के मित्र होते हैं और हमारी प्रकृति का अभिन्न अंग होते हैं। इसलिए उनके प्रति श्रद्धा प्रदर्शित करने के लिए नाग पंचमी का व्रत और पूजन किया जाता है। नाग पंचमी के दिन नागों की पूजा करने से भय, रोग, अकाल मृत्यु आदि से मुक्ति मिलती है, और भगवान शिव की भी कृपा प्राप्त होती है।
2025 में कब है नागपंचमी
हमारे वैदिक पंचांग के अनुसार सावन मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नाग पंचमी पर्व मनाया जाता है। इस वर्ष सावन माह की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि का आरंभ 28 जुलाई को रात में 11: 25 पर होगा और 29 जुलाई की रात 12: 45 तक पंचमी तिथि होगी। उदया तिथि नियम के अनुसार नाग पंचमी दिन मंगलवार, 29 जुलाई को मनाई जाएगी । नाग पंचमी की पूजन का मुहूर्त सुबह 5: 41 से सुबह 8:41 मिनट तक रहेगा।
व्रत की पूजा का विधि-विधान
ज्योतिष विद्या के अनुसार पंचम तिथि के स्वामी नाग देवता होते हैं। इस व्रत के एक दिन पूर्व चतुर्थी को एक समय का भोजन कर पंचमी को पूरे दिन का उपवास रखने का विधान है। गरुड़ पुराण के अनुसार वृद्धि अपने घर के दोनों और नागों को चित्रित करके उनकी विधि विधान अनुसार पूजा करें। कुछ स्थानों पर लोग रस्सी में साथ गांठे लगाकर उसे सर्प का आकार प्रदान करते हैं। कुछ स्थानों पर लोग गाय के गोबर से सर्प की आकृति बनाते हैं तो कुछ स्थानों पर लोग नाग देवता के मंदिर जाते हैं और पूजन करते हैं। कुछ लोग वास्तविक नाग नागिन के जोड़े को दूध पिलाते हैं। भक्ति भाव के साथ गंध, पुष्प, धूप, कच्चा दूध, खील, भीगे हुए बाजरे, देसी घी से नाग देवता का पूजन करते हैं। उसके पश्चात सुयोग्य ब्राह्मण को दान-दक्षिणा और दूध से बनी सामग्री प्रदान करते हैं।
नागपंचमी का महाभारत से सम्बन्ध
महाभारत में प्रसंग है कि अर्जुन के पुत्र राजा परीक्षित को एक ऋषि के श्राप के कारण सर्प ने डंस लिया था। अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए राजा जन्मेजय जोकि अर्जुन के पौत्र थे नागों के विनाश के लिए एक सर्प यज्ञ किया था। जिसमें अनेक प्रकार के सांपों की यज्ञ की ज्वाला में भस्म होकर मृत्यु हो गई। तब तक्षक आदि नाग नागमाता मंशा देवी और ऋषि जरत्कारु के पुत्र आस्तिक मुनि के शरण में गए। तब आस्तिक मुनि ने नागों को अग्नि से बचाया और उनके शरीर पर दूध, जल आदि डालकर उनका उपचार किया। जिससे नाग बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने आस्तिक मुनि को आशीर्वाद दिया कि जो भी उनकी पूजा करेगा उसे कभी भी नागों से भय नहीं होगा। इस घटना के बाद से श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नाग पंचमी के रूप में मनाया जाने लगा। इस दिन नागों की पूजा करते हैं और उन्हें दूध चढ़ाते हैं।
इसके अतिरिक्त एक अन्य कथा में भगवान कृष्ण द्वारा कालिया नाग को पराजित करने और वृंदावन के लोगों का बचाने का उल्लेख आता है जिसका संबंध नाग पंचमी से है।
व्रत की कथा
प्राचीन काल में एक गांव में एक किसान अपने पुत्र एवं पुत्री के साथ आनंदपूर्वक रहता था। एक दिन वह जब अपना खेत जोत रहा था, तब एक सर्पिणी के तीन बच्चे हाल के नीचे कुचलकर मर गए। सर्पिणी नें बदला लेने के लिए किसान और उसके पुत्र को रात्रि में डस लिया। सुबह जब किसान की पुत्री ने देखा कि भाई और पिता को सर्पिणी ने डस दिया है तब वह दूध से भरा कटोरा लेकर आई और सर्पिणी के सामने रखकर अपने पिता के अपराध की क्षमा मांगने लगी। इससे सर्पिणी का क्रोध शांत हो गया और उसने प्रसन्न होकर उसके पिता और भाई का जहर वापस खींचकर उसने जीवित कर दिया। उसे दिन श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि थी। तब से ही नाग पंचमी मनाने की प्रथम चालू हुई।
नाग पंचमी के दिन व्रत रखकर नाग देवता के पूजन करने से उनका आशीर्वाद मिलता है। हमारे पितृ भी प्रसन्न होते हैं। कालसर्प दोष और राहु केतु जनित पीड़ा का शमन होता है साथ ही भगवान शिव का भी आशीर्वाद मिलता है।












