
क्या राहु केतु पहले नही थे? फ़िर क्या कारण है कि आज के बच्चों की कुंडलियों में राहु केतु से बनने वाले दुर्योग अधिक है। क्या इसके लिये माता पिता जिम्मेदार है?
आपने देखा होगा कि पहले संयुक्त परिवार होते थे और बुजुर्गों का पूरा नियंत्रण रहता था, सभी नियमों का पालन करते थे लेकिन पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव ने भारतीय संस्कृति की इस सुंदरता पे भी धीरे धीरे नज़र लगा दी है, परिवार अब टूटने लगे है एक बड़े से घर से निकल कर सभी अलग अलग स्वच्छंद जीवन की चाह में माचिस के डिब्बे जैसे मकानों में सिमट गए हैं।
एकल परिवारों ने जहाँ स्वतंत्रता दी है वही उच्छृंखलता भी दी है। युवा दंपत्ति को अब हर समय शारीरिक संबंध बनाने के अवसर है जिसके परिणामस्वरुप वो निषेध समय मे, दिन में भी संबंध बनाते है और उसके दुष्प्रभाव उनके गृहस्थ जीवन के साथ ही उनकी संतान पे भी होते है।
कौन से हैं वे निषेध दिन व समय जब शारीरिक संबंध नही बनाना चाहिये
- अमावस्या के दिन संबंध बनाने से दाम्पत्य जीवन पे बुरा प्रभाव होता है, इस दिन गर्भधारण करने वाली स्त्री को तो कष्ट होता ही है आने वाली संतान पे भी नकारात्मक प्रभाव होता है।
- पूनम की रात भी निषेध है बच्चे मानसिक रूप से कमज़ोर हो सकते है, अन्य दुर्योग लेकर भी जन्म ले सकते है।
- चतुर्थी, अष्टमी, एकादशी तिथी पे निषेध है, पति पत्नी संयम रखें ।
- संक्राति के समय सात्विक रहे। दूरी बनाकर रखें।
- रविवार का दिन भी निषेध है। वैसे शनिवार व मंगलवार भी दूरी रखे तो उत्तम। संतान क्रोधी व नकारात्मक हो सकती है।
- श्राद्ध व पितृ पक्ष के दिन भूलकर भी संबंध न बनाएं।
- जिस दिन व्रत रखे, पूर्णतया सात्विकता का पालन करें।
- नवरात्रि के दिन यदि संबंध बनाते है और स्त्री गर्भधारण करती है तो संतान के साथ दंपत्ति का पूरा जीवन संघर्ष होता है।
- सूर्य ग्रहण व चंद्र ग्रहण पे संबंध न बनाएं।
- दिन के समय संबंध बनाने पे स्त्री गर्भधारण करती है तो संतान पे बुरा प्रभाव पड़ता है। रात्रि को शुक्र बली होता है रात्रि में दूसरे प्रहर का चुनाव करें।
- ब्रह्म मुहूर्त, संध्या काल निषेध है।
सम्पूर्ण विकास के लिये जीवन में स्वतंत्रता ज़रूरी है किंतु उच्छृंखलता आगे का मार्ग संघर्षमय कर सकती है।आपकी संतान पे और आप के जीवन की नकारात्मकता के लिये आप ही जिम्मेदार हो सकते है।अत: अनुशासित व संतुलित जीवनशैली अपनाएं।











