Sunday, September 6, 2026
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EV वालों की बल्ले-बल्ले! बैटरी लाइफ बढ़ाने के लिए आया देसी इनोवेशन

भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री लगातार बढ़ रही है, लेकिन इनके साथ जुड़ी बैटरी की लाइफ और परफॉर्मेंस अब भी ग्राहकों के लिए बड़ी चिंता बनी हुई है। खासतौर पर शहरों में इलेक्ट्रिक स्कूटर, बाइक और कारों को बार-बार रुकना, अचानक गति पकड़ना और तेजी से ब्रेक लगाना पड़ता है।

इस तरह की ड्राइविंग कंडीशन में बैटरी से अचानक ज्यादा करंट की मांग होती है। दूसरी तरफ रीजेनरेटिव ब्रेकिंग के दौरान तेजी से ऊर्जा वापस सिस्टम में आती है। बार-बार होने वाले इन बदलावों से बैटरी पर इलेक्ट्रिकल और थर्मल स्ट्रेस बढ़ सकता है, जिसका असर लंबे समय में उसकी क्षमता और सर्विस लाइफ पर पड़ने की संभावना रहती है।

इसी चुनौती को कम करने के लिए NIT राउरकेला के शोधकर्ताओं ने एक नई हाइब्रिड एनर्जी स्टोरेज तकनीक विकसित की है। इसमें बैटरी के साथ सुपरकैपेसिटर को जोड़ा गया है, ताकि अचानक बढ़ने वाली पावर डिमांड को बेहतर तरीके से संभाला जा सके और बैटरी को तेज करंट के झटकों से राहत मिल सके। खास बात यह है कि शोध टीम को इस तकनीक के लिए पेटेंट भी मिल चुका है।

बैटरी के साथ सुपरकैपेसिटर का कॉम्बिनेशन

इस नई तकनीक की सबसे खास बात बैटरी और सुपरकैपेसिटर का एक साथ इस्तेमाल है। सुपरकैपेसिटर पारंपरिक बैटरी की तुलना में बहुत तेजी से चार्ज और डिस्चार्ज हो सकता है। यही क्षमता इसे इलेक्ट्रिक वाहनों में अचानक आने वाली पावर डिमांड को संभालने के लिए उपयोगी बनाती है।

उदाहरण के तौर पर जब वाहन को अचानक तेज एक्सीलरेशन चाहिए, तो मोटर को तुरंत ज्यादा पावर की जरूरत होती है। ऐसी स्थिति में सुपरकैपेसिटर अतिरिक्त पावर उपलब्ध कराने में मदद कर सकता है। इससे बैटरी को अचानक बहुत ज्यादा करंट देने की जरूरत कम हो सकती है।

इसी तरह जब वाहन अचानक ब्रेक करता है, तो रीजेनरेटिव ब्रेकिंग के जरिए ऊर्जा वापस इलेक्ट्रिकल सिस्टम में आती है। इस दौरान सुपरकैपेसिटर तेजी से उस ऊर्जा को स्वीकार करने में मदद कर सकता है। इससे बैटरी पर अचानक चार्जिंग का दबाव कम किया जा सकता है और पूरे पावर सिस्टम को ज्यादा स्थिर तरीके से चलाने में मदद मिल सकती है।

तीन प्रमुख हिस्सों से तैयार किया गया सिस्टम

शोधकर्ताओं ने इस हाइब्रिड एनर्जी स्टोरेज सिस्टम को ज्यादा जटिल बनाने के बजाय अपेक्षाकृत सरल डिजाइन पर तैयार किया है। इसमें मुख्य रूप से सिंगल कनवर्टर, इंडक्टर और सिंगल कंट्रोल सिस्टम का इस्तेमाल किया गया है। सिंगल कनवर्टर बैटरी और सुपरकैपेसिटर दोनों को वाहन के इलेक्ट्रिकल सिस्टम से जोड़ने का काम करता है।

इससे अलग-अलग पावर इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस की जरूरत को कम किया जा सकता है। सिस्टम में लगाया गया इंडक्टर करंट के अचानक बढ़ने या घटने को नियंत्रित करने में मदद करता है। वहीं सिंगल कंट्रोल स्ट्रेटजी पूरे पावर फ्लो को मैनेज करती है।

वाहन किस परिस्थिति में चल रहा है, उसके हिसाब से यह सिस्टम बैटरी और सुपरकैपेसिटर के बीच ऊर्जा के प्रवाह को नियंत्रित करता है। इस डिजाइन का उद्देश्य सिस्टम की जटिलता कम करने के साथ-साथ पावर मैनेजमेंट को ज्यादा प्रभावी बनाना है।

तेज एक्सीलरेशन में ऐसे करेगा काम

अब सवाल उठता है कि आखिर यह तकनीक असल ड्राइविंग में किस तरह काम करेगी। मान लीजिए कोई इलेक्ट्रिक स्कूटर या कार ट्रैफिक सिग्नल से निकलते समय अचानक तेज गति पकड़ती है। इस दौरान मोटर को कम समय में ज्यादा पावर की जरूरत होती है।

सामान्य बैटरी सिस्टम में यह अतिरिक्त पावर डिमांड सीधे बैटरी पर पड़ सकती है और बैटरी को तेज करंट देना पड़ता है। नई हाइब्रिड तकनीक में सुपरकैपेसिटर इस अचानक बढ़ी हुई मांग को पूरा करने में सहायता करता है। इससे बैटरी पर आने वाला पीक करंट कम किया जा सकता है। इसी तरह जब ड्राइवर अचानक ब्रेक लगाता है, तो मोटर जनरेटर की तरह काम करते हुए ऊर्जा वापस सिस्टम में भेजती है।

सुपरकैपेसिटर इस ऊर्जा को तेजी से स्वीकार कर सकता है। इस तरह बैटरी को अचानक बहुत ज्यादा ऊर्जा लेने से राहत मिल सकती है। बार-बार होने वाले ऐसे चार्ज-डिस्चार्ज झटकों को कम करना बैटरी की लंबी अवधि की सेहत के लिए फायदेमंद हो सकता है।

टेस्टिंग में मिला 48 वोल्ट का स्थिर आउटपुट

NIT राउरकेला की टीम ने इस तकनीक को अलग-अलग ड्राइविंग परिस्थितियों में टेस्ट किया है। परीक्षण के दौरान अचानक एक्सीलरेशन, ब्रेकिंग और वाहन की बदलती गति जैसी स्थितियों को शामिल किया गया। रिसर्च के अनुसार सिस्टम ने 48 वोल्ट का स्थिर आउटपुट बनाए रखने की क्षमता दिखाई।

इसके अलावा बैटरी करंट में अचानक होने वाले बदलावों को नियंत्रित करने में भी सिस्टम प्रभावी पाया गया। जरूरत पड़ने पर सुपरकैपेसिटर ने तेजी से पावर सपोर्ट देकर सिस्टम की अतिरिक्त ऊर्जा मांग को संभालने में अहम भूमिका निभाई।

इससे यह संकेत मिलता है कि हाइब्रिड एनर्जी स्टोरेज सिस्टम शहरों की स्टॉप-एंड-गो ड्राइविंग जैसी परिस्थितियों में उपयोगी साबित हो सकता है। हालांकि वास्तविक वाहनों में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से पहले अलग-अलग परिस्थितियों में इसकी और टेस्टिंग तथा सिस्टम इंटीग्रेशन की जरूरत होगी।

इन इलेक्ट्रिक वाहनों में हो सकता है इस्तेमाल

यह तकनीक खासतौर पर 24 से 60 वोल्ट DC आधारित लो-वोल्टेज इलेक्ट्रिक व्हीकल प्लेटफॉर्म के लिए उपयोगी बताई गई है। इसका मतलब है कि भविष्य में इसे कई तरह के छोटे और लो-वोल्टेज इलेक्ट्रिक वाहनों में इस्तेमाल किया जा सकता है।

संभावित उपयोग वाले वाहनों में इलेक्ट्रिक स्कूटर, इलेक्ट्रिक मोटरसाइकिल, ई-रिक्शा, इलेक्ट्रिक कार्गो थ्री-व्हीलर, कैंपस मोबिलिटी व्हीकल और इंडस्ट्रियल यूटिलिटी व्हीकल शामिल हैं। अगर यह तकनीक बड़े पैमाने पर व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए सफल रहती है, तो इससे इलेक्ट्रिक वाहनों के पावर मैनेजमेंट को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।

सबसे बड़ा फायदा यह हो सकता है कि अचानक पावर डिमांड और रीजेनरेटिव ब्रेकिंग के दौरान बैटरी पर पड़ने वाले दबाव को कम किया जा सके। ऐसे में यह भारतीय परिस्थितियों में खासतौर पर शहरी इलेक्ट्रिक मोबिलिटी के लिए एक उपयोगी तकनीकी कदम साबित हो सकता है।

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