जब भी बॉलीवुड में पावरफुल महिला पुलिस अधिकारियों की बात होती है, तो सबसे पहला नाम शिवानी शिवाजी रॉय का ही आता है। 2014 में रानी मुखर्जी ने मर्दानी के ज़रिए न सिर्फ ह्यूमन ट्रैफिकिंग जैसे गंभीर मुद्दे को सामने रखा, बल्कि बॉक्स ऑफिस पर भी शानदार प्रदर्शन किया। ₹21 करोड़ के बजट में बनी फिल्म ने ₹60 करोड़ की कमाई की।
2019 में आए इसके सीक्वल ने भी सफलता की कहानी दोहराई—₹27 करोड़ के बजट पर ₹67 करोड़ का बिज़नेस। अब 2026 में, कोविड के बाद बदले हुए सिनेमाई माहौल और दर्शकों के नए टेस्ट के बीच ‘मर्दानी 3’ बड़े स्केल और बढ़े हुए बजट के साथ सिनेमाघरों में दस्तक देती है। सवाल यही है—क्या यह फिल्म पुराने रोमांच को कायम रख पाती है?
कहानी: अपराध, साज़िश और एक खौफनाक साम्राज्य
मर्दानी फ्रेंचाइज़ी की पहचान हमेशा से रही है—
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एक जघन्य अपराध
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एक सनकी और खतरनाक विलेन
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और शिवानी शिवाजी रॉय का न्याय की तलाश में पीछा
इस बार कहानी शुरू होती है एक हाई-प्रोफाइल किडनैपिंग केस से। एक राजदूत की बेटी का अपहरण हो जाता है, लेकिन मामला तब और उलझ जाता है जब उसके साथ उसकी केयरटेकर की बेटी के गायब होने की बात सामने आती है।
जांच आगे बढ़ने पर शिवानी का सामना होता है एक ऐसे क्राइम नेटवर्क से, जिसकी जड़ें भिखारी माफिया और अंग तस्करी तक फैली हुई हैं। इस अंधेरी दुनिया की सरगना है—अम्मा (मल्लिका प्रसाद), जिसकी पकड़ शहर की नालियों से लेकर सत्ता के ऊपरी गलियारों तक फैली हुई है।
पहला हाफ: पकड़ मजबूत, सस्पेंस बरकरार
फिल्म का पहला हाफ काफी प्रभावी है। जैसे-जैसे शिवानी लड़कियों तक पहुंचने की कोशिश करती है, कहानी दर्शकों को बांधे रखती है।
यहां फिल्म का सबसे बड़ा सरप्राइज़ पैकेज बनकर उभरती हैं मल्लिका प्रसाद उर्फ अम्मा।
विलेन की ताकत: अम्मा का खौफ
मर्दानी फ्रेंचाइज़ी हमेशा अपने दमदार विलेन के लिए जानी जाती रही है और अम्मा उस विरासत को मजबूती से आगे बढ़ाती है।
मल्लिका प्रसाद की परफॉर्मेंस इतनी डरावनी है कि जब भी वह स्क्रीन पर आती हैं, रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उनकी मौजूदगी सीधे दर्शकों के दिमाग पर असर डालती है और फिल्म को एक अलग लेवल का खौफ देती है।
रानी मुखर्जी की परफॉर्मेंस: उम्मीद से थोड़ी कम
जहां विलेन चमकता है, वहीं शिवानी शिवाजी रॉय के किरदार में इस बार थोड़ी कमी महसूस होती है।
पिछले दोनों पार्ट्स में जो आग, ठहराव और एनर्जी थी, वह यहां पूरी तरह नज़र नहीं आती। कई दृश्यों में रानी मुखर्जी का प्रदर्शन जरूरत से ज्यादा लाउड और ड्रामैटिक लगता है।
उनका बार-बार चिल्लाना शिवानी के आम तौर पर शांत और सशक्त स्वभाव से मेल नहीं खाता।
सपोर्टिंग कास्ट: कोशिश अच्छी, लेखन कमजोर
जानकी बोदीवाला ने ईमानदारी से अभिनय किया है, लेकिन उनके किरदार की राइटिंग इतनी कमजोर है कि वह चाहकर भी कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ पातीं।
कमियां: क्लाइमैक्स और पेसिंग बनी बड़ी समस्या
फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसका क्लाइमैक्स है।
जहां पहला हाफ और दूसरा हाफ का शुरुआती हिस्सा उत्साह बनाए रखते हैं, वहीं अंत में सब कुछ बेहद जल्दबाज़ी में समेट दिया जाता है।
क्लाइमैक्स में जिस भावनात्मक गहराई की जरूरत थी, वह नदारद रहती है। शिवानी और पीड़ित लड़कियों के दर्द से दर्शक वैसा कनेक्शन महसूस नहीं कर पाते, जैसा पहले पार्ट्स में हुआ था।
इसके अलावा, फिल्म की शुरुआत में गति थोड़ी धीमी है, जो थ्रिलर के असर को कुछ जगह कमज़ोर करती है।
डायरेक्शन और सिनेमैटोग्राफी
डायरेक्टर अभिराज मीनावाला फिल्म को बड़े स्तर पर ले जाने की कोशिश करते हैं, लेकिन इस प्रक्रिया में मर्दानी की रॉ और रियलिस्टिक फील कहीं-कहीं खो जाती है।
डायरेक्शन औसत से बेहतर है, लेकिन यादगार नहीं।
हालांकि, सिनेमैटोग्राफी शानदार है।
शहर के अंधेरे कोनों और भिखारी माफिया के ठिकानों को खूबसूरती और खतरनाक अंदाज़ में फिल्माया गया है। लाइटिंग और फ्रेमिंग फिल्म के डार्क टोन को मजबूती देती है।
बैकग्राउंड स्कोर: फिल्म की जान
मर्दानी 3 का बैकग्राउंड स्कोर इसकी सबसे बड़ी ताकतों में से एक है।
डार्क और तनावपूर्ण माहौल को संगीत शानदार तरीके से उभारता है। खासकर अम्मा के दृश्यों में साउंड डिजाइन बेहद डरावना है, जो उसके सनकीपन को और खौफनाक बना देता है।
वहीं, शिवानी के एक्शन सीन्स में मर्दानी का सिग्नेचर थीम म्यूज़िक अलग ही जोश भर देता है।
आख़िरी फैसला: देखें या छोड़ें?
‘मर्दानी 3’ एक अच्छी क्राइम थ्रिलर है, लेकिन यह अपनी पिछली दो फिल्मों—खासकर पहली मर्दानी—के स्तर तक नहीं पहुंच पाती। क्राइम थ्रिलर पसंद करने वालों के लिए यह एक बार देखने लायक है।
रानी मुखर्जी के फैंस को उनकी परफॉर्मेंस पसंद आ सकती है, लेकिन निष्पक्ष दर्शकों को पुरानी शिवानी शिवाजी रॉय की कमी जरूर खलेगी। फिल्म का सबसे बड़ा प्लस पॉइंट है अम्मा का किरदार, जो इसे देखने की सबसे ठोस वजह बनता है।











