बातूनी लड़कियां: वंदना पराशर

वंदना पराशर

लड़कियां खरपतवार नहीं होती हैं
कि
उन्हें जब चाहे उखाड़ कर फेंक दो
धरती की कोख से जन्मी वो संजीवनी हैं लड़कियां
जो बार–बार काटे जाने के बाद भी
मरती नहीं हैं,
हरदम हरियर ही रहती हैं
जिनकी जड़ें माटी में गहरी जमी हुई हैं
अम्मा खुश होती है अब
अपनी लाडो को बातूनी कहे जाने पर
बातूनी लड़कियां बातें छिपाकर रखना नहीं जानती
बिना लाग-लपेट के वह बोल देती हैं सच–सच
धर्म के ठेकेदारों से भयभीत नहीं होती हैं अब
निडर होकर अपने अधिकार के लिए लड़ना जानती हैं
ये बातूनी लड़कियां
अम्मा जानती है चुप्पी साध कर जीने का दंश
इसलिए कहती हैं अपनी लाडो से
चुप–चुप मत रहना तू
अपने लिए बोलना
अपने लिए लड़ना बस्स