अनामिका गुप्ता
गुरु हूं मैं
लेकिन कहाँ कितना
पूरा या अधूरा
कुछ समझ नहीं पा रहा हूं
क्या दब गया जिम्मेदारियां के बोझतले
सर्वांगीण विकास शिष्यों का करपा रहा हूं ??
अब बस बनकर मास्टरजी
लटकाये थैला……
परचिया 𝙱𝙻𝙾 की बांटने जा रहा हूं
देना है बच्चों को पोषण
सो फल सब्जियां लेने जा रहा हूं
करना है प्रजातंत्र का निर्माण
सो इलेक्शन करवाने जा रहा हूं
रूठा रूठा सा है जाने कयों
मुलाकात नहीं होती नेटवर्क से घंटों
फिर भी शाला दर्पण चलाएं जा रहा हूं
बांटनी हैं साइकिले किताबें छात्रवृत्ति नैपकिन
डाक भी तो बनानी है पूरा दिन
लेने हैं टेस्ट चेक करनी है कॉपियां
सो कलम पे कलम घिसे जा रहा हूं
करनी है उपस्थिति पूरी
लेने बच्चों को उनके घर जा रहा हूं
चलिए यह सब तो किससे हुए पुराने
एक नया अध्याय रचाने जा रहा हूं
परीक्षा लेते-लेते हुए बरसों
अब खुद परीक्षा देने जा रहा हूं
पढ़ाता था मैं शिष्यों को बरसों से
पर अब खुद शिष्य बनने जा रहा हूं
एक नया इतिहास रचने जा रहा हूं
पास करने को 𝚃𝙴𝚃 मैभी कोचिंग जा रहा हूं
मैं फिर से शिषय बनने जा रहा हूं
सभी परंपराओं और आदर्श को निभा रहा हूं
बदल गया भारत का गुरूकुल इतिहास
बदला है समाज या बदला समय
कुछ सोच नहीं पा रहा हूं समझ नहीं पा रहा हूं
भविष्य शिष्यों का सुरक्षित कर पा रहा हूं
क्या सर्वांगीण विकास कर पा रहा हूं
गुरजी .गुरूकुल खो गये हैं
जाने कहाँ
ढूंढने जा रहा हूं















