रूची शाही
बहुत नाजुक हूँ दिल की, चटक कर टूट जाती हूँ
मैं उनके हाथों से हरदम फिसलकर छूट जाती हूँ
मनाना उनको नहीं आता, जुल्म है ये मेरे दिल पर
मेरी आदत है मैं अक्सर बिगड़कर रूठ जाती हूँ
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आधी अधूरी जैसी भी है तेरी मेरी ही कहानी है
बीत गई सो बात गई अब तो बची खुची निशानी है
हम पत्थर के हो भी गए हैं सच ही तो कहते हो तुम
दर्द कहां होता है हमको ये तो बस आँखों में पानी है
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सूनी दुनिया सूनी गलियां सूना है दिल का आंगन
सूने हैं सब बाग-बगीचे, सूना है मन का उपवन
दो खेमों में बंटकर रह गया ये मेरा भी जीवन
एक तरफ तेरी यादें हैं एक तरफ मेरा पागलपन















